प्रिये वृणीष्वामरभावमश्मत्
इति त्रपाकृद्वचनं न किं नः ।
त्वत्पादपद्मे शरणं प्रविश्य
स्वयं वयं येन जिजीविषामः ॥
प्रिये वृणीष्वामरभावमश्मत्
इति त्रपाकृद्वचनं न किं नः ।
त्वत्पादपद्मे शरणं प्रविश्य
स्वयं वयं येन जिजीविषामः ॥
इति त्रपाकृद्वचनं न किं नः ।
त्वत्पादपद्मे शरणं प्रविश्य
स्वयं वयं येन जिजीविषामः ॥
अन्वयः
AI
हे प्रिये ! "अस्मत् अमर-भावम् वृणीष्व" इति नः वचनम् किम् त्रपा-कृत् न (अस्ति)? येन वयम् स्वयम् त्वत्-पाद-पद्मे शरणम् प्रविश्य जिजीविषामः ।
Summary
AI
O beloved! Is not our statement, "Choose immortality from us," a cause for shame? Because we ourselves desire to live by taking refuge at your lotus feet.
पदच्छेदः
AI
| प्रिये | प्रिया (८.१) | O beloved |
| वृणीष्व | वृणीष्व (√वृ कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | choose |
| अमर | अमर | immortal |
| भावम् | भाव (२.१) | state |
| अस्मत् | अस्मद् (५.१) | from us |
| इति | इति | thus |
| त्रपा | त्रपा | shame |
| कृत् | कृत् (१.१) | causing |
| वचनम् | वचन (१.१) | the statement |
| न | न | not |
| किम् | किम् | is it |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
| त्वत् | युष्मद् | your |
| पाद | पाद | feet |
| पद्मे | पद्म (७.१) | at the lotus of |
| शरणम् | शरण (२.१) | refuge |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| स्वयम् | स्वयम् | ourselves |
| वयं | अस्मद् (१.३) | we |
| येन | यद् (३.१) | because |
| जिजीविषामः | जिजीविषामः (√जीव् +सन्+उ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we desire to live |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रि | ये | वृ | णी | ष्वा | म | र | भा | व | म | श्म |
| ति | ति | त्र | पा | कृ | द्व | च | नं | न | किं | नः |
| त्व | त्पा | द | प | द्मे | श | र | णं | प्र | वि | श्य |
| स्व | यं | व | यं | ये | न | जि | जी | वि | षा | मः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.