ददाम किं ते सुधयाऽधरेण
त्वदास्य एव स्वयमास्यते हि ।
चन्द्रं विजित्य स्वयमेव भावि
त्वदाननं तन्मखभागभोजि ॥
ददाम किं ते सुधयाऽधरेण
त्वदास्य एव स्वयमास्यते हि ।
चन्द्रं विजित्य स्वयमेव भावि
त्वदाननं तन्मखभागभोजि ॥
त्वदास्य एव स्वयमास्यते हि ।
चन्द्रं विजित्य स्वयमेव भावि
त्वदाननं तन्मखभागभोजि ॥
अन्वयः
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ते अधरेण सुधया किम् ददाम? हि (सुधा) त्वत्-आस्ये एव स्वयम् आस्यते । त्वत्-आननम् चन्द्रम् विजित्य स्वयम् एव तत्-मख-भाग-भोजि भावि ।
Summary
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What can we give you with nectar from our lip? For nectar itself resides in your mouth. Your face, having conquered the moon, will itself become the enjoyer of the moon's share of the sacrificial offerings.
पदच्छेदः
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| ददाम | ददाम (√दा कर्तरि लोट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | shall we give |
| किम् | किम् | what |
| ते | युष्मद् (४.१) | to you |
| सुधया | सुधा (३.१) | with nectar |
| अधरेण | अधर (३.१) | from our lip |
| त्वत् | युष्मद् | your |
| आस्ये | आस्य (७.१) | in the mouth |
| एव | एव | itself |
| स्वयम् | स्वयम् | itself |
| आस्यते | आस्यते (√आस् +यक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is seated |
| हि | हि | for |
| चन्द्रम् | चन्द्र (२.१) | the moon |
| विजित्य | विजित्य (वि√जि+ल्यप्) | having conquered |
| स्वयम् | स्वयम् | itself |
| एव | एव | indeed |
| भावि | भाविन् (√भू+णिनि, १.१) | will be |
| त्वत् | युष्मद् | your |
| आननम् | आनन (१.१) | face |
| तत् | तद् | its (the moon's) |
| मख | मख | sacrifice |
| भाग | भाग | share |
| भोजि | भोजिन् (√भुज्+णिनि, १.१) | the enjoyer of |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | दा | म | किं | ते | सु | ध | या | ऽध | रे | ण |
| त्व | दा | स्य | ए | व | स्व | य | मा | स्य | ते | हि |
| च | न्द्रं | वि | जि | त्य | स्व | य | मे | व | भा | वि |
| त्व | दा | न | नं | त | न्म | ख | भा | ग | भो | जि |
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