क्षीणेन मध्येऽपि सतोदरेण
यत्प्राप्यते नाक्रमणं वलिभ्यः ।
सर्वाङ्गशुद्धौ तदनङ्गराज्य
विजृम्भितं भीमभुवीह चित्रम् ॥
क्षीणेन मध्येऽपि सतोदरेण
यत्प्राप्यते नाक्रमणं वलिभ्यः ।
सर्वाङ्गशुद्धौ तदनङ्गराज्य
विजृम्भितं भीमभुवीह चित्रम् ॥
यत्प्राप्यते नाक्रमणं वलिभ्यः ।
सर्वाङ्गशुद्धौ तदनङ्गराज्य
विजृम्भितं भीमभुवीह चित्रम् ॥
अन्वयः
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इह भीमभुवा सर्वाङ्गशुद्धौ क्षीणेन सता अपि उदरेण मध्ये वलिभ्यः यत् आक्रमणम् न प्राप्यते, तत् अनङ्गराज्यविजृम्भितम् चित्रम् ।
Summary
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It is a wonder that Damayanti, whose every limb is perfect, is not attacked in her waist by the three folds, despite her belly being slender. This is truly the glorious expansion of the kingdom of the god of love.
पदच्छेदः
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| क्षीणेन | क्षीण (√क्षि+क्त, ३.१) | by the slender |
| मध्ये | मध्य (७.१) | in the waist |
| अपि | अपि | even |
| सता | सत् (√अस्+शतृ, ३.१) | being |
| उदरेण | उदर (३.१) | by the belly |
| यत् | यत् | that |
| प्राप्यते | प्राप्यते (प्र√आप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is obtained |
| न | न | not |
| आक्रमणम् | आक्रमण (१.१) | an attack |
| वलिभ्यः | वलि (५.३) | from the folds |
| सर्वाङ्गशुद्धौ | सर्व–अङ्ग–शुद्धि (७.१) | in the perfection of all limbs |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| अनङ्गराज्य | अनङ्ग–राज्य | of the kingdom of Kama |
| विजृम्भितम् | विजृम्भित (वि√जृम्भ्+क्त, १.१) | expansion |
| भीमभुवा | भीमभु (१.१) | by Damayanti |
| इह | इह | here |
| चित्रम् | चित्र (१.१) | is a wonder |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षी | णे | न | म | ध्ये | ऽपि | स | तो | द | रे | ण |
| य | त्प्रा | प्य | ते | ना | क्र | म | णं | व | लि | भ्यः |
| स | र्वा | ङ्ग | शु | द्धौ | त | द | न | ङ्ग | रा | ज्य |
| वि | जृ | म्भि | तं | भी | म | भु | वी | ह | चि | त्रम् |
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