कराग्रजाग्रच्छतकोटिरर्थी
ययोरिमौ तौ तुलयेत्कुचौ चेत् ।
सर्वं तदा श्रीफलमुन्मदिष्णु
जातं वटीमप्यधुना न लब्धुम् ॥
कराग्रजाग्रच्छतकोटिरर्थी
ययोरिमौ तौ तुलयेत्कुचौ चेत् ।
सर्वं तदा श्रीफलमुन्मदिष्णु
जातं वटीमप्यधुना न लब्धुम् ॥
ययोरिमौ तौ तुलयेत्कुचौ चेत् ।
सर्वं तदा श्रीफलमुन्मदिष्णु
जातं वटीमप्यधुना न लब्धुम् ॥
अन्वयः
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कराग्रजाग्रत् शतकोटिः अर्थी चेत् ययोः इमौ तौ कुचौ तुलयेत्, तदा उन्मदिष्णु सर्वम् श्रीफलम् अधुना वटीम् अपि लब्धुम् न जातम् ।
Summary
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If Indra, the suitor with the hundred-edged weapon that awakens at his fingertips, were to weigh these two breasts of hers, then all the proud Bilva fruits would not be able to fetch even a single cowrie shell in value now.
पदच्छेदः
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| कराग्रजाग्रत् | कर–अग्र–जाग्रत् (√जागृ+शतृ) | awakening at the fingertips |
| शतकोटिः | शतकोटि (१.१) | Indra (wielder of the hundred-edged vajra) |
| अर्थी | अर्थिन् (१.१) | as a suitor |
| ययोः | यद् (६.२) | of which two |
| इमौ | इदम् (१.२) | these two |
| तौ | तद् (२.२) | those two |
| तुलयेत् | तुलयेत् (√तुल् +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | were to weigh |
| कुचौ | कुच (२.२) | breasts |
| चेत् | चेत् | if |
| सर्वम् | सर्व (१.१) | all |
| तदा | तदा | then |
| श्रीफलम् | श्रीफल (१.१) | the Bilva fruit |
| उन्मदिष्णु | उन्मदिष्णु (उद्√मद्+इष्णुच्, १.१) | proud |
| जातम् | जात (√जन्+क्त, १.१) | became |
| वटीम् | वटी (२.१) | a cowrie shell |
| अपि | अपि | even |
| अधुना | अधुना | now |
| न | न | not |
| लब्धुम् | लब्धुम् (√लभ्+तुमुन्) | to fetch |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | रा | ग्र | जा | ग्र | च्छ | त | को | टि | र | र्थी |
| य | यो | रि | मौ | तौ | तु | ल | ये | त्कु | चौ | चेत् |
| स | र्वं | त | दा | श्री | फ | ल | मु | न्म | दि | ष्णु |
| जा | तं | व | टी | म | प्य | धु | ना | न | ल | ब्धुम् |
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