विभ्रम्य तच्चारुनितम्बचक्रे
दूतस्य दृक्तस्य खलु स्खलन्ती ।
स्थिरा चिरादास्य तदूरुरम्भा-
स्तम्भावुपाश्लिष्य करेण गाढम् ॥
विभ्रम्य तच्चारुनितम्बचक्रे
दूतस्य दृक्तस्य खलु स्खलन्ती ।
स्थिरा चिरादास्य तदूरुरम्भा-
स्तम्भावुपाश्लिष्य करेण गाढम् ॥
दूतस्य दृक्तस्य खलु स्खलन्ती ।
स्थिरा चिरादास्य तदूरुरम्भा-
स्तम्भावुपाश्लिष्य करेण गाढम् ॥
अन्वयः
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तस्य भूपस्य दृक् तत्-चारु-नितम्ब-चक्रे विभ्रम्य खलु स्खलन्ती, चिरात् करेण तदूरुरम्भास्तम्भौ गाढम् उपाश्लिष्य स्थिरा आस।
Summary
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Having wandered over the beautiful orb of her hips and indeed stumbling, the king's gaze, after a long time, became steady by tightly embracing with its 'hand' (i.e., focusing on) the two pillars of her plantain-like thighs.
पदच्छेदः
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| विभ्रम्य | विभ्रम्य (वि√भ्रम्+ल्यप्) | Having wandered |
| तच्चारुनितम्बचक्रे | तद्–चारु–नितम्ब–चक्र (७.१) | over the beautiful orb of her hips |
| भूपस्य | भूप (६.१) | of the king |
| दृक् | दृश् (१.१) | the gaze |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| खलु | खलु | indeed |
| स्खलन्ती | स्खलन्ती (√स्खल्+शतृ, १.१) | stumbling |
| स्थिरा | स्थिर (१.१) | steady |
| चिरात् | चिर (५.१) | after a long time |
| आस | आस (√अस् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| तदूरुरम्भास्तम्भौ | तद्–ऊरु–रम्भा–स्तम्भ (२.२) | the two pillars of her plantain-like thighs |
| उपाश्लिष्य | उपाश्लिष्य (उप+आ√श्लिष्+ल्यप्) | having embraced |
| करेण | कर (३.१) | with its hand |
| गाढम् | गाढम् | tightly |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | भ्र | म्य | त | च्चा | रु | नि | त | म्ब | च | क्रे |
| दू | त | स्य | दृ | क्त | स्य | ख | लु | स्ख | ल | न्ती |
| स्थि | रा | चि | रा | दा | स्य | त | दू | रु | र | म्भा |
| स्त | म्भा | वु | पा | श्लि | ष्य | क | रे | ण | गा | ढम् |
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