प्रियाङ्गपान्था कुचयोर्निवृत्य
निवृत्य लोला नलदृग्भ्रमन्ती ।
बभौतमां तन्मृगनाभिलेप-
तमःसमासादितदिग्भ्रमेव ॥
प्रियाङ्गपान्था कुचयोर्निवृत्य
निवृत्य लोला नलदृग्भ्रमन्ती ।
बभौतमां तन्मृगनाभिलेप-
तमःसमासादितदिग्भ्रमेव ॥
निवृत्य लोला नलदृग्भ्रमन्ती ।
बभौतमां तन्मृगनाभिलेप-
तमःसमासादितदिग्भ्रमेव ॥
अन्वयः
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प्रियाङ्गपान्था लोला नलदृक् कुचयोः निवृत्त्य निवृत्त्य भ्रमन्ती, तन्मृगनाभिलेपतमःसमासादितदिग्भ्रमा इव, तमाम् बभौ।
Summary
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Nala's fickle gaze, a traveler on the path of his beloved's limbs, turning back again and again from her breasts and wandering, shone exceedingly, as if it had lost its sense of direction in the darkness of the musk-ointment applied there.
पदच्छेदः
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| प्रियाङ्गपान्था | प्रिया–अङ्ग–पथिन् (१.१) | a traveler on the path of the beloved's limbs |
| कुचयोः | कुच (५.२) | from the two breasts |
| निवृत्य | निवृत्य (नि√वृत्+ल्यप्) | having turned back |
| निवृत्य | निवृत्य (नि√वृत्+ल्यप्) | having turned back |
| लोला | लोल (१.१) | fickle |
| नलदृक् | नल–दृश् (१.१) | Nala's gaze |
| भ्रमन्ती | भ्रमन्ती (√भ्रम्+शतृ, १.१) | wandering |
| बभौतमाम् | बभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.)–तमाम् | shone exceedingly |
| तन्मृगनाभिलेपतमःसमासादितदिग्भ्रमा | तद्–मृगनाभि–लेप–तमस्–समासादित (सम्+आ√सद्+णिच्+क्त)–दिश्–भ्रम (१.१) | one whose sense of direction was confused by the darkness of the musk-ointment applied there |
| इव | इव | as if |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रि | या | ङ्ग | पा | न्था | कु | च | यो | र्नि | वृ | त्य |
| नि | वृ | त्य | लो | ला | न | ल | दृ | ग्भ्र | म | न्ती |
| ब | भौ | त | मां | त | न्मृ | ग | ना | भि | ले | प |
| त | मः | स | मा | सा | दि | त | दि | ग्भ्र | मे | व |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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