इहाविशद्येन पथातिवक्रः
शास्त्रौघनिष्यन्दसुधाप्रवाहः ।
सोऽस्याः श्रवः पत्रयुगे प्रणालि-
रेखेव धावत्यभिकर्णकूपम् ॥
इहाविशद्येन पथातिवक्रः
शास्त्रौघनिष्यन्दसुधाप्रवाहः ।
सोऽस्याः श्रवः पत्रयुगे प्रणालि-
रेखेव धावत्यभिकर्णकूपम् ॥
शास्त्रौघनिष्यन्दसुधाप्रवाहः ।
सोऽस्याः श्रवः पत्रयुगे प्रणालि-
रेखेव धावत्यभिकर्णकूपम् ॥
अन्वयः
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येन अतिवक्रः पथा शास्त्र-ओघ-निष्यन्द-सुधा-प्रवाहः इह अविशत्, सः अस्याः श्रवः-पत्रयुगे अभिकर्णकूपम् प्रणालि-रेखा इव धावति ।
Summary
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The very crooked path by which the nectar-stream of the essence of all scriptures entered her, that path now runs like the line of a conduit on her pair of ear-lobes towards the cavity of her ears.
पदच्छेदः
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| इह | इह | here |
| अविशत् | अविशत् (√विश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| पथा | पथिन् (३.१) | path |
| अतिवक्रः | अतिवक्र (१.१) | very crooked |
| शास्त्रौघनिष्यन्दसुधाप्रवाहः | शास्त्र-ओघ-निष्यन्द-सुधा-प्रवाह (१.१) | the stream of nectar which is the essence of the multitude of scriptures |
| सः | तद् (१.१) | that |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| श्रवःपत्रयुगे | श्रवःपत्रयुग (७.१) | on the pair of ear-lobes |
| प्रणालिरेखा | प्रणालिरेखा (१.१) | a line of a channel |
| इव | इव | like |
| धावति | धावति (√धाव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | runs |
| अभिकर्णकूपम् | अभिकर्णकूपम् | towards the cavity of the ear |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | हा | वि | श | द्ये | न | प | था | ति | व | क्रः |
| शा | स्त्रौ | घ | नि | ष्य | न्द | सु | धा | प्र | वा | हः |
| सो | ऽस्याः | श्र | वः | प | त्र | यु | गे | प्र | णा | लि |
| रे | खे | व | धा | व | त्य | भि | क | र्ण | कू | पम् |
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