अस्या मुखेनैव विजित्य नित्य-
स्पर्धी मिलत्कुङ्कुमरोषभासा ।
प्रसह्य चन्द्रः खलु नह्यमानः
स्यादेव तिष्ठत्परिवेषपाशः ॥
अस्या मुखेनैव विजित्य नित्य-
स्पर्धी मिलत्कुङ्कुमरोषभासा ।
प्रसह्य चन्द्रः खलु नह्यमानः
स्यादेव तिष्ठत्परिवेषपाशः ॥
स्पर्धी मिलत्कुङ्कुमरोषभासा ।
प्रसह्य चन्द्रः खलु नह्यमानः
स्यादेव तिष्ठत्परिवेषपाशः ॥
अन्वयः
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नित्य-स्पर्धी चन्द्रः मिलत्-कुङ्कुम-रोष-भासा अस्याः मुखेन एव विजित्य, प्रसह्य नह्यमानः (सन्) तिष्ठत्-परिवेष-पाशः स्यात् एव खलु ।
Summary
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The ever-competing moon, having been conquered by her face which glows with an anger like saffron, is indeed being forcefully bound, and his halo is the very rope that ties him.
पदच्छेदः
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| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| मुखेन | मुख (३.१) | by the face |
| एव | एव | alone |
| विजित्य | विजित्य (वि√जि+ल्यप्) | having been conquered |
| नित्य-स्पर्धी | नित्य–स्पर्धिन् (१.१) | constantly competing |
| मिलत्-कुङ्कुम-रोष-भासा | मिलत् (√मिल्+शतृ)–कुङ्कुम–रोष–भास् (३.१) | by (the face) whose angry glow resembles saffron |
| प्रसह्य | प्रसह्य (प्र√सह्+ल्यप्) | forcefully |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| खलु | खलु | indeed |
| नह्यमानः | नह्यमान (√नह्+शानच्+कर्मणि, १.१) | being bound |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would be |
| एव | एव | indeed |
| तिष्ठत्-परिवेष-पाशः | तिष्ठत् (√स्था+शतृ)–परिवेष–पाश (१.१) | he whose halo is a binding rope |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्या | मु | खे | नै | व | वि | जि | त्य | नि | त्य |
| स्प | र्धी | मि | ल | त्कु | ङ्कु | म | रो | ष | भा | सा |
| प्र | स | ह्य | च | न्द्रः | ख | लु | न | ह्य | मा | नः |
| स्या | दे | व | ति | ष्ठ | त्प | रि | वे | ष | पा | शः |
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