अर्काय पत्ये खलु तिष्ठमाना
भृङ्गैर्मितामक्षिभिरम्बुकेलौ ।
भैमीमुखस्य श्रियमम्बुजिन्यो
याचन्ति विस्तारितपद्महस्ताः ॥
अर्काय पत्ये खलु तिष्ठमाना
भृङ्गैर्मितामक्षिभिरम्बुकेलौ ।
भैमीमुखस्य श्रियमम्बुजिन्यो
याचन्ति विस्तारितपद्महस्ताः ॥
भृङ्गैर्मितामक्षिभिरम्बुकेलौ ।
भैमीमुखस्य श्रियमम्बुजिन्यो
याचन्ति विस्तारितपद्महस्ताः ॥
अन्वयः
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अम्बु-केलौ अर्काय पत्ये तिष्ठमानाः अम्बुजिन्यः विस्तारित-पद्म-हस्ताः (सत्यः) भृङ्गैः अक्षिभिः मिताम् भैमी-मुखस्य श्रियम् खलु याचन्ति ।
Summary
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During water-sports, the lotus plants, waiting for their husband the sun, stretch out their lotus-hands and beg for the beauty of Damayanti's face, a beauty that is observed by the bees with their eyes.
पदच्छेदः
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| अर्काय | अर्क (४.१) | for the sun |
| पत्ये | पति (४.१) | for the husband |
| खलु | खलु | indeed |
| तिष्ठमानाः | तिष्ठमान (√स्था+शानच्, १.३) | waiting |
| भृङ्गैः | भृङ्ग (३.३) | by the bees |
| मिताम् | मित (√मा+क्त, २.१) | observed |
| अक्षिभिः | अक्षि (३.३) | with eyes |
| अम्बु-केलौ | अम्बु–केलि (७.१) | in water-sport |
| भैमी-मुखस्य | भैमी–मुख (६.१) | of Bhaimi's (Damayanti's) face |
| श्रियम् | श्री (२.१) | the beauty |
| अम्बुजिन्यः | अम्बुजिनी (१.३) | the lotus-plants |
| याचन्ति | याचन्ति (√याच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | beg for |
| विस्तारित-पद्म-हस्ताः | विस्तारित (वि√स्तृ+क्त)–पद्म–हस्त (१.३) | with their lotus-hands outstretched |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | र्का | य | प | त्ये | ख | लु | ति | ष्ठ | मा | ना |
| भृ | ङ्गै | र्मि | ता | म | क्षि | भि | र | म्बु | के | लौ |
| भै | मी | मु | ख | स्य | श्रि | य | म | म्बु | जि | न्यो |
| या | च | न्ति | वि | स्ता | रि | त | प | द्म | ह | स्ताः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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