दिवारजन्यो रविसोमभीते
चन्द्राम्बुजे निक्षिपतः स्वलक्ष्मीम् ।
आस्ये यदास्या न तदा तयोः श्रीः
एकश्रियेदं तु कदा न कान्तम् ॥
दिवारजन्यो रविसोमभीते
चन्द्राम्बुजे निक्षिपतः स्वलक्ष्मीम् ।
आस्ये यदास्या न तदा तयोः श्रीः
एकश्रियेदं तु कदा न कान्तम् ॥
चन्द्राम्बुजे निक्षिपतः स्वलक्ष्मीम् ।
आस्ये यदास्या न तदा तयोः श्रीः
एकश्रियेदं तु कदा न कान्तम् ॥
अन्वयः
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रवि-सोम-भीते चन्द्र-अम्बुजे दिवा-रजन्यौ (इव) स्व-लक्ष्मीम् निक्षिपतः । यदा अस्याः आस्ये (तौ) न (स्तः), तदा तयोः श्रीः (नास्ति) । इदम् तु एक-श्रिया कदा न कान्तम्?
Summary
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The moon (afraid of the sun) and the lotus (afraid of the moon) deposit their beauty in her face, like day and night. When they are not in her face, they have no beauty. But this face, with its constant beauty, when is it not lovely?
पदच्छेदः
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| दिवा-रजन्यौ | दिवा–रजनी (१.२) | day and night |
| रवि-सोम-भीते | रवि–सोम–भीत (√भी+क्त, १.२) | afraid of the sun and moon respectively |
| चन्द्र-अम्बुजे | चन्द्र–अम्बुज (१.२) | the moon and the lotus |
| निक्षिपतः | निक्षिपतः (नि√क्षिप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) | deposit |
| स्व-लक्ष्मीम् | स्व–लक्ष्मी (२.१) | their own beauty |
| आस्ये | आस्य (७.१) | in the face |
| यदा | यदा | when |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| न | न | not |
| तदा | तदा | then |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| श्रीः | श्री (१.१) | beauty |
| एक-श्रिया | एक–श्री (३.१) | with constant beauty |
| इदम् | इदम् (१.१) | this (face) |
| तु | तु | but |
| कदा | कदा | when |
| न | न | not |
| कान्तम् | कान्त (१.१) | lovely |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | वा | र | ज | न्यो | र | वि | सो | म | भी | ते |
| च | न्द्रा | म्बु | जे | नि | क्षि | प | तः | स्व | ल | क्ष्मीम् |
| आ | स्ये | य | दा | स्या | न | त | दा | त | योः | श्रीः |
| ए | क | श्रि | ये | दं | तु | क | दा | न | का | न्तम् |
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