कण्ठे वसन्ती चतुरा यदस्याः
सरस्वती वादयते विपञ्चीम् ।
तदेव वाग्भूय मुखे मृगाक्ष्याः
श्रोतुः श्रुतौ याति सुधारसत्वम् ॥
कण्ठे वसन्ती चतुरा यदस्याः
सरस्वती वादयते विपञ्चीम् ।
तदेव वाग्भूय मुखे मृगाक्ष्याः
श्रोतुः श्रुतौ याति सुधारसत्वम् ॥
सरस्वती वादयते विपञ्चीम् ।
तदेव वाग्भूय मुखे मृगाक्ष्याः
श्रोतुः श्रुतौ याति सुधारसत्वम् ॥
अन्वयः
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यत् चतुरा सरस्वती अस्याः कण्ठे वसन्ती विपञ्चीम् वादयते, तत् एव मृग-अक्ष्याः मुखे वाक्-भूय श्रोतुः श्रुतौ सुधा-रसत्वम् याति ।
Summary
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The music that the clever Saraswati, residing in her throat, plays on the Veena—that very music, becoming speech in the mouth of the deer-eyed one, attains the quality of nectar in the listener's ear.
पदच्छेदः
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| कण्ठे | कण्ठ (७.१) | in the throat |
| वसन्ती | वसत् (√वस्+शतृ, १.१) | residing |
| चतुरा | चतुर (१.१) | clever |
| यत् | यद् | that which |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| सरस्वती | सरस्वती (१.१) | Saraswati |
| वादयते | वादयते (√वद् +णिच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | plays |
| विपञ्चीम् | विपञ्ची (२.१) | the Veena |
| तत् | तद् (१.१) | that very thing |
| एव | एव | |
| वाक्-भूय | वाच्–भूय (√भू+क्त्वा) | becoming speech |
| मुखे | मुख (७.१) | in the mouth |
| मृग-अक्ष्याः | मृग–अक्षि (६.१) | of the deer-eyed one |
| श्रोतुः | श्रोतृ (६.१) | of the listener |
| श्रुतौ | श्रुति (७.१) | in the ear |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| सुधा-रसत्वम् | सुधा–रस–त्व (२.१) | the state of being nectar |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | ण्ठे | व | स | न्ती | च | तु | रा | य | द | स्याः |
| स | र | स्व | ती | वा | द | य | ते | वि | प | ञ्चीम् |
| त | दे | व | वा | ग्भू | य | मु | खे | मृ | गा | क्ष्याः |
| श्रो | तुः | श्रु | तौ | या | ति | सु | धा | र | स | त्वम् |
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