पद्माङ्कसद्मानमवेक्ष्य लक्ष्मीम्
एकस्य विष्णोः श्रयणात्सपत्नीम् ।
आस्येन्दुमस्या भजते जिताब्जं
सरस्वती तद्विजिगीषया किम् ॥
पद्माङ्कसद्मानमवेक्ष्य लक्ष्मीम्
एकस्य विष्णोः श्रयणात्सपत्नीम् ।
आस्येन्दुमस्या भजते जिताब्जं
सरस्वती तद्विजिगीषया किम् ॥
एकस्य विष्णोः श्रयणात्सपत्नीम् ।
आस्येन्दुमस्या भजते जिताब्जं
सरस्वती तद्विजिगीषया किम् ॥
अन्वयः
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सरस्वती, एकस्य विष्णोः श्रयणात् पद्म-अङ्क-सद्मानम् लक्ष्मीम् सपत्नीम् अवेक्ष्य, तत्-विजिगीषया किम् अस्याः जित-अब्जम् आस्य-इन्दुम् भजते?
Summary
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Is it that Saraswati, seeing Lakshmi (whose abode is the lotus) as her co-wife due to their shared refuge in Vishnu, resorts to Damayanti's moon-like face—which has already conquered the lotus—out of a desire to vanquish Lakshmi?
पदच्छेदः
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| पद्म-अङ्क-सद्मानम् | पद्म–अङ्क–सद्मन् (२.१) | whose abode is the lotus |
| अवेक्ष्य | अवेक्ष्य (अव√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| लक्ष्मीम् | लक्ष्मी (२.१) | Lakshmi |
| एकस्य | एक (६.१) | of the one |
| विष्णोः | विष्णु (६.१) | of Vishnu |
| श्रयणात् | श्रयण (५.१) | due to taking refuge with |
| सपत्नीम् | सपत्नी (२.१) | as a co-wife |
| आस्य-इन्दुम् | आस्य–इन्दु (२.१) | the moon of her face |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her |
| भजते | भजते (√भज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | resorts to |
| जित-अब्जम् | जित (√जि+क्त)–अब्ज (२.१) | which has conquered the lotus |
| सरस्वती | सरस्वती (१.१) | Saraswati |
| तत्-विजिगीषया | तद्–विजिगीषा (३.१) | with the desire to conquer her (Lakshmi) |
| किम् | किम् | is it that? |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | द्मा | ङ्क | स | द्मा | न | म | वे | क्ष्य | ल | क्ष्मी |
| मे | क | स्य | वि | ष्णोः | श्र | य | णा | त्स | प | त्नीम् |
| आ | स्ये | न्दु | म | स्या | भ | ज | ते | जि | ता | ब्जं |
| स | र | स्व | ती | त | द्वि | जि | गी | ष | या | किम् |
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