राजौ द्विजानामिह राजदन्ताः
संबिभ्रति श्रोत्रियबिभ्रमं यत् ।
उद्वेगरागादिमृजावदाताः
चत्वार एते तदवैमि मुक्ताः ॥
राजौ द्विजानामिह राजदन्ताः
संबिभ्रति श्रोत्रियबिभ्रमं यत् ।
उद्वेगरागादिमृजावदाताः
चत्वार एते तदवैमि मुक्ताः ॥
संबिभ्रति श्रोत्रियबिभ्रमं यत् ।
उद्वेगरागादिमृजावदाताः
चत्वार एते तदवैमि मुक्ताः ॥
अन्वयः
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इह द्विजानाम् राजौ यत् राजदन्ताः श्रोत्रिय-विभ्रमम् संबिभ्रति, तत् अवैमि एते उद्वेग-राग-आदि-मृजा-अवदाताः चत्वारः मुक्ताः (सन्ति) ।
Summary
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Since the front teeth in this row of "twice-born" (teeth) bear the semblance of learned Brahmins, I understand that these four, pure and cleansed of agitation and passion (or, white and free from stains), are liberated souls (or pearls).
पदच्छेदः
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| राजौ | राजि (७.१) | in the row |
| द्विजानाम् | द्विज (६.३) | of the teeth |
| इह | इह | here |
| राजदन्ताः | राजदन्त (१.३) | the front teeth |
| संबिभ्रति | संबिभ्रति (सम्√भृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bear |
| श्रोत्रिय-विभ्रमम् | श्रोत्रिय–विभ्रम (२.१) | the semblance of learned Brahmins |
| यत् | यद् | since |
| उद्वेग-राग-आदि-मृजा-अवदाताः | उद्वेग–राग–आदि–मृजा–अवदात (१.३) | purified by cleansing of agitation, passion, etc. |
| चत्वारः | चतुर् (१.३) | four |
| एते | एतद् (१.३) | these |
| तत् | तद् | therefore |
| अवैमि | अवैमि (अव√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I understand |
| मुक्ताः | मुक्त (√मुच्+क्त, १.३) | liberated ones (or pearls) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | जौ | द्वि | जा | ना | मि | ह | रा | ज | द | न्ताः |
| सं | बि | भ्र | ति | श्रो | त्रि | य | बि | भ्र | मं | यत् |
| उ | द्वे | ग | रा | गा | दि | मृ | जा | व | दा | ताः |
| च | त्वा | र | ए | ते | त | द | वै | मि | मु | क्ताः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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