सेयं ममैतद्विरहार्तिमूर्च्छा
तमीविभातस्य विभाति संध्या ।
महेन्द्रकाष्ठागतरागकर्त्री
द्विजैरमीभिः समुपास्यमाना ॥
सेयं ममैतद्विरहार्तिमूर्च्छा
तमीविभातस्य विभाति संध्या ।
महेन्द्रकाष्ठागतरागकर्त्री
द्विजैरमीभिः समुपास्यमाना ॥
तमीविभातस्य विभाति संध्या ।
महेन्द्रकाष्ठागतरागकर्त्री
द्विजैरमीभिः समुपास्यमाना ॥
अन्वयः
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सा इयम् एतत्-विरह-आर्ति-मूर्च्छा, महेन्द्र-काष्ठा-आगत-राग-कर्त्री, अमीभिः द्विजैः समुपास्यमाना (सती), मम तमी-विभातस्य संध्या विभाति ।
Summary
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This swoon of mine, caused by the pain of separation from her, appears like the dawn after the night. It brings redness to the eastern quarter (her red lips) and is attended upon by these "twice-born" (her teeth, with a pun on Brahmins).
पदच्छेदः
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| सा | तद् (१.१) | that |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| एतत्-विरह-आर्ति-मूर्च्छा | एतत्–विरह–आर्ति–मूर्च्छा (१.१) | this swoon from the pain of separation |
| तमी-विभातस्य | तमी–विभात (६.१) | of the dawn of the night |
| विभाति | विभाति (वि√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shines as |
| संध्या | संध्या (१.१) | the twilight |
| महेन्द्र-काष्ठा-आगत-राग-कर्त्री | महेन्द्र–काष्ठा–आगत (आ√गम्+क्त)–राग–कर्तृ (१.१) | causing redness to appear in the eastern direction |
| द्विजैः | द्विज (३.३) | by the teeth (or Brahmins) |
| अमीभिः | अदस् (३.३) | by these |
| समुपास्यमाना | समुपास्यमान (सम्+उप√आस्+शानच्+कर्मणि, १.१) | being served |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| से | यं | म | मै | त | द्वि | र | हा | र्ति | मू | र्च्छा |
| त | मी | वि | भा | त | स्य | वि | भा | ति | सं | ध्या |
| म | हे | न्द्र | का | ष्ठा | ग | त | रा | ग | क | र्त्री |
| द्वि | जै | र | मी | भिः | स | मु | पा | स्य | मा | ना |
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