संभुज्यमानाद्य मया निशान्ते
स्वप्नेऽनुभूता मधुराधरेयम् ।
असीमलावण्यरदच्छदेत्थं
कथं मयैव प्रतिपद्यते वा ॥
संभुज्यमानाद्य मया निशान्ते
स्वप्नेऽनुभूता मधुराधरेयम् ।
असीमलावण्यरदच्छदेत्थं
कथं मयैव प्रतिपद्यते वा ॥
स्वप्नेऽनुभूता मधुराधरेयम् ।
असीमलावण्यरदच्छदेत्थं
कथं मयैव प्रतिपद्यते वा ॥
अन्वयः
AI
अद्य निशान्ते स्वप्ने मया संभुज्यमाना अनुभूता इयम् मधुर-अधरा, असीम-लावण्य-रदच्छदा (सती), इत्थम् कथम् मया एव प्रतिपद्यते वा?
Summary
AI
Nala muses: "This sweet-lipped one, whom I experienced being enjoyed in a dream at night's end, she of limitless beauty in her lips—how is it that she is perceived in reality by me alone in this way?"
पदच्छेदः
AI
| संभुज्यमाना | संभुज्यमान (सम्√भुज्+शानच्+कर्मणि, १.१) | being enjoyed |
| अद्य | अद्य | today |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| निशान्ते | निशान्त (७.१) | at the end of the night |
| स्वप्ने | स्वप्न (७.१) | in a dream |
| अनुभूता | अनुभूत (अनु√भू+क्त, १.१) | experienced |
| मधुर-अधरा | मधुर–अधर (१.१) | she with sweet lips |
| इयम् | इदम् (१.१) | this one |
| असीम-लावण्य-रदच्छदा | असीम–लावण्य–रदच्छद (१.१) | she whose lips have limitless beauty |
| इत्थम् | इत्थम् | in this way |
| कथम् | कथम् | how |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| एव | एव | alone |
| प्रतिपद्यते | प्रतिपद्यते (प्रति√पद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is perceived |
| वा | वा | or/indeed |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | भु | ज्य | मा | ना | द्य | म | या | नि | शा | न्ते |
| स्व | प्ने | ऽनु | भू | ता | म | धु | रा | ध | रे | यम् |
| अ | सी | म | ला | व | ण्य | र | द | च्छ | दे | त्थं |
| क | थं | म | यै | व | प्र | ति | प | द्य | ते | वा |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.