ऋणीकृता किं हरिणीभिरासीत्
अस्याः सकाशान्नयनद्वयश्रीः ।
भूयोगुणेयं सकला बलाद्य-
त्ताभ्योऽनयाऽलभ्यत बिभ्यतीभ्यः ॥
ऋणीकृता किं हरिणीभिरासीत्
अस्याः सकाशान्नयनद्वयश्रीः ।
भूयोगुणेयं सकला बलाद्य-
त्ताभ्योऽनयाऽलभ्यत बिभ्यतीभ्यः ॥
अस्याः सकाशान्नयनद्वयश्रीः ।
भूयोगुणेयं सकला बलाद्य-
त्ताभ्योऽनयाऽलभ्यत बिभ्यतीभ्यः ॥
अन्वयः
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अस्याः नयन-द्वय-श्रीः हरिणीभिः सकाशात् किम् ऋणी-कृता आसीत्? यत् इयम् भूयो-गुणा सकला (श्रीः) बिभ्यतीभ्यः ताभ्यः अनया बलात् अलभ्यत ।
Summary
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Was the beauty of her pair of eyes initially indebted to the does? It seems so, because this entire beauty, now multiplied in quality, was forcibly taken back by her from those very same fearful does.
पदच्छेदः
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| ऋणी-कृता | ऋणीकृत (√कृ+क्त, १.१) | Made indebted |
| किम् | किम् | was it? |
| हरिणीभिः | हरिणी (३.३) | by the does |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| अस्याः | इदम् (६.१) | her |
| सकाशात् | सकाशात् | from |
| नयन-द्वय-श्रीः | नयन–द्वय–श्री (१.१) | the beauty of the pair of eyes |
| भूयो-गुणा | भूयस्–गुणा (१.१) | multiplied in quality |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| सकला | सकल (१.१) | entire (beauty) |
| बलात् | बल (५.१) | by force |
| यत् | यत् | because |
| ताभ्यः | तद् (५.३) | from them |
| अनया | इदम् (३.१) | by her |
| अलभ्यत | अलभ्यत (√लभ् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was obtained |
| बिभ्यतीभ्यः | बिभ्यत् (√भी+शतृ, ५.३) | from the fearful ones |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ऋ | णी | कृ | ता | किं | ह | रि | णी | भि | रा | सी |
| त | स्याः | स | का | शा | न्न | य | न | द्व | य | श्रीः |
| भू | यो | गु | णे | यं | स | क | ला | ब | ला | द्य |
| त्ता | भ्यो | ऽन | या | ऽल | भ्य | त | बि | भ्य | ती | भ्यः |
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