त्वचः समुत्तार्य दलानि रीत्या
मोचात्वचः पञ्चषपाटनायाम् ।
सारैर्गृहीतैर्विधिरुत्पलौघात्
अस्यामभूदीक्षणरूपशिल्पी ॥
त्वचः समुत्तार्य दलानि रीत्या
मोचात्वचः पञ्चषपाटनायाम् ।
सारैर्गृहीतैर्विधिरुत्पलौघात्
अस्यामभूदीक्षणरूपशिल्पी ॥
मोचात्वचः पञ्चषपाटनायाम् ।
सारैर्गृहीतैर्विधिरुत्पलौघात्
अस्यामभूदीक्षणरूपशिल्पी ॥
अन्वयः
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विधिः पञ्च-ष-पाटनायाम् रीत्या मोचा-त्वचः दलानि त्वचः समुत्तार्य, उत्पल-ओघात् गृहीतैः सारैः अस्याम् ईक्षण-रूप-शिल्पी अभूत् ।
Summary
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The Creator, after peeling off the layers of a plantain stem in a manner of five or six splits, and taking the essence from a multitude of lotuses, became the artisan who crafted the form of her eyes.
पदच्छेदः
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| त्वचः | त्वच् (२.३) | the skins |
| समुत्तार्य | समुत्तार्य (सम्+उद्√तॄ+ल्यप्) | having peeled off |
| दलानि | दल (२.३) | layers |
| रीत्या | रीति (३.१) | in the manner |
| मोचा-त्वचः | मोचा–त्वच् (६.१) | of a plantain stem |
| पञ्च-ष-पाटनायाम् | पञ्चष–पाटन (७.१) | of five or six splits |
| सारैः | सार (३.३) | with the essences |
| गृहीतैः | गृहीत (√ग्रह्+क्त, ३.३) | taken |
| विधिः | विधि (१.१) | the Creator |
| उत्पल-ओघात् | उत्पल–ओघ (५.१) | from a multitude of lotuses |
| अस्याम् | इदम् (७.१) | in her case |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| ईक्षण-रूप-शिल्पी | ईक्षण–रूप–शिल्पिन् (१.१) | the artisan of the form of her eyes |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | चः | स | मु | त्ता | र्य | द | ला | नि | री | त्या |
| मो | चा | त्व | चः | प | ञ्च | ष | पा | ट | ना | याम् |
| सा | रै | र्गृ | ही | तै | र्वि | धि | रु | त्प | लौ | घा |
| त | स्या | म | भू | दी | क्ष | ण | रू | प | शि | ल्पी |
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