सेयं मृदुः कौसुमचापयष्टिः
स्मरस्य मुष्टिग्रहणार्हमध्या ।
तनोति नः श्रीमदपाङ्गमुक्तां
मोहाय या दृष्टिशरौघवृष्टिम् ॥
सेयं मृदुः कौसुमचापयष्टिः
स्मरस्य मुष्टिग्रहणार्हमध्या ।
तनोति नः श्रीमदपाङ्गमुक्तां
मोहाय या दृष्टिशरौघवृष्टिम् ॥
स्मरस्य मुष्टिग्रहणार्हमध्या ।
तनोति नः श्रीमदपाङ्गमुक्तां
मोहाय या दृष्टिशरौघवृष्टिम् ॥
अन्वयः
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या स्मरस्य मृदुः कौसुम-चाप-यष्टिः मुष्टि-ग्रहण-अर्ह-मध्या, सा इयम् श्रीमत्-अपाङ्ग-मुक्ताम् दृष्टि-शर-ओघ-वृष्टिम् नः मोहाय तनोति ।
Summary
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She, who is the soft, floral bow-staff of Kama, with a middle portion fit to be grasped by his fist, unleashes upon us a shower of arrow-like glances from the beautiful corners of her eyes, all for the sake of our delusion.
पदच्छेदः
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| सा | तद् (१.१) | That |
| इयम् | इदम् (१.१) | this one |
| मृदुः | मृदु (१.१) | soft |
| कौसुम-चाप-यष्टिः | कौसुम–चाप–यष्टि (१.१) | floral bow-staff |
| स्मरस्य | स्मर (६.१) | of Kama |
| मुष्टि-ग्रहण-अर्ह-मध्या | मुष्टि–ग्रहण–अर्ह–मध्या (१.१) | with a middle fit to be grasped by the fist |
| तनोति | तनोति (√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spreads |
| नः | अस्मद् (२.३) | upon us |
| श्रीमत्-अपाङ्ग-मुक्ताम् | श्रीमत्–अपाङ्ग–मुक्त (√मुच्+क्त, २.१) | released from the beautiful corners of the eyes |
| मोहाय | मोह (४.१) | for delusion |
| या | यद् (१.१) | which |
| दृष्टि-शर-ओघ-वृष्टिम् | दृष्टि–शर–ओघ–वृष्टि (२.१) | a shower of a multitude of arrow-like glances |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| से | यं | मृ | दुः | कौ | सु | म | चा | प | य | ष्टिः |
| स्म | र | स्य | मु | ष्टि | ग्र | ह | णा | र्ह | म | ध्या |
| त | नो | ति | नः | श्री | म | द | पा | ङ्ग | मु | क्तां |
| मो | हा | य | या | दृ | ष्टि | श | रौ | घ | वृ | ष्टिम् |
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