इषुत्रयेणैव जगत्त्रयस्य
विनिर्जयात्पुष्पमयाशुगेन ।
शेषा द्विबाणी सफलीकृतेयं
प्रियादृगम्भोजपदेऽभिषिच्य ॥
इषुत्रयेणैव जगत्त्रयस्य
विनिर्जयात्पुष्पमयाशुगेन ।
शेषा द्विबाणी सफलीकृतेयं
प्रियादृगम्भोजपदेऽभिषिच्य ॥
विनिर्जयात्पुष्पमयाशुगेन ।
शेषा द्विबाणी सफलीकृतेयं
प्रियादृगम्भोजपदेऽभिषिच्य ॥
अन्वयः
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पुष्पमय-आशुगेन इषु-त्रयेण एव जगत्-त्रयस्य विनिर्जयात्, शेषा द्वि-बाणी प्रिया-दृक्-अम्भोज-पदे अभिषिच्य इयम् सफली-कृता ।
Summary
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Since the wielder of floral arrows (Kama) conquered the three worlds with just three of his arrows, he has made his remaining two arrows fruitful by anointing them to the esteemed position of the beloved's lotus-like eyes.
पदच्छेदः
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| इषु-त्रयेण | इषु–त्रय (३.१) | with a triad of arrows |
| एव | एव | only |
| जगत्-त्रयस्य | जगत्–त्रय (६.१) | of the three worlds |
| विनिर्जयात् | विनिर्जय (वि+निर्√जि+घञ्, ५.१) | from the complete conquest |
| पुष्पमय-आशुगेन | पुष्पमय–आशुग (३.१) | by the one with floral arrows (Kama) |
| शेषा | शेष (१.१) | the remaining |
| द्वि-बाणी | द्वि–बाणी (१.१) | two arrows |
| सफली-कृता | सफलीकृत (√कृ+क्त, १.१) | were made fruitful |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| प्रिया-दृक्-अम्भोज-पदे | प्रिया–दृश्–अम्भोज–पद (७.१) | in the position of the beloved's lotus-like eyes |
| अभिषिच्य | अभिषिच्य (अभि√सिच्+ल्यप्) | having anointed |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | षु | त्र | ये | णै | व | ज | ग | त्त्र | य | स्य |
| वि | नि | र्ज | या | त्पु | ष्प | म | या | शु | गे | न |
| शे | षा | द्वि | बा | णी | स | फ | ली | कृ | ते | यं |
| प्रि | या | दृ | ग | म्भो | ज | प | दे | ऽभि | षि | च्य |
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