भ्रूम्यां प्रियाया भवता मनोभू-
चापेन चापे घनसारभावः ।
निजां यदप्लोषदशामपेक्ष्य
संप्रत्यनेनाधिकवीर्यतार्जि ॥
भ्रूम्यां प्रियाया भवता मनोभू-
चापेन चापे घनसारभावः ।
निजां यदप्लोषदशामपेक्ष्य
संप्रत्यनेनाधिकवीर्यतार्जि ॥
चापेन चापे घनसारभावः ।
निजां यदप्लोषदशामपेक्ष्य
संप्रत्यनेनाधिकवीर्यतार्जि ॥
अन्वयः
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प्रियायाः भ्रूभ्याम् भवता मनोभू-चापेन चापे घनसार-भावः (आसादितः) । यत् निजाम् अप्लोष-दशाम् अपेक्ष्य सम्प्रति अनेन अधिक-वीर्यता अर्जि ।
Summary
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By becoming the eyebrows of the beloved, Kama's bow has attained the state of camphor on a bowstring (which increases its power). Because, considering its previous state of being unburnt (unlike Kama himself), it has now acquired even greater potency.
पदच्छेदः
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| भ्रूभ्याम् | भ्रू (३.२) | by the two eyebrows |
| प्रियायाः | प्रिया (६.१) | of the beloved |
| भवता | भवत् (√भू+शतृ, ३.१) | by becoming |
| मनोभू-चापेन | मनोभू–चाप (३.१) | by Kama's bow |
| चापे | चाप (७.१) | on the bowstring |
| घनसार-भावः | घनसार–भाव (१.१) | the state of camphor |
| निजाम् | निज (२.१) | its own |
| यत् | यत् | because |
| अप्लोष-दशाम् | अप्लोष–दशा (२.१) | unburnt state |
| अपेक्ष्य | अपेक्ष्य (अप√ईक्ष्+ल्यप्) | having considered |
| सम्प्रति | सम्प्रति | now |
| अनेन | इदम् (३.१) | by it |
| अधिक-वीर्यता | अधिक–वीर्यता (१.१) | greater potency |
| अर्जि | अर्जि (√ऋज् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was acquired |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ्रू | म्यां | प्रि | या | या | भ | व | ता | म | नो | भू |
| चा | पे | न | चा | पे | घ | न | सा | र | भा | वः |
| नि | जां | य | द | प्लो | ष | द | शा | म | पे | क्ष्य |
| सं | प्र | त्य | ने | ना | धि | क | वी | र्य | ता | र्जि |
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