अस्या यदास्येन पुरस्तिरश्च
तिरस्कृतं शीतरुचान्धकारम् ।
स्फुटस्फुटद्भङ्गिकचच्छलेन
तदेव पश्चादिदमस्ति बद्धम् ॥
अस्या यदास्येन पुरस्तिरश्च
तिरस्कृतं शीतरुचान्धकारम् ।
स्फुटस्फुटद्भङ्गिकचच्छलेन
तदेव पश्चादिदमस्ति बद्धम् ॥
तिरस्कृतं शीतरुचान्धकारम् ।
स्फुटस्फुटद्भङ्गिकचच्छलेन
तदेव पश्चादिदमस्ति बद्धम् ॥
अन्वयः
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शीत-रुचा यत् अन्धकारम् पुरः तिरः च तिरस्कृतम्, तत् एव अन्धकारम् अस्याः आस्येन स्फुट-स्फुटत्-भङ्गि-कच-छलेन पश्चात् इदम् बद्धम् अस्ति ।
Summary
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The very darkness that was vanquished in front and on the sides by the moon, has now been captured behind by her face, under the pretext of her mass of hair with its distinctly breaking curls.
पदच्छेदः
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| अस्याः | इदम् (६.१) | by her |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| आस्येन | आस्य (३.१) | by face |
| पुरः | पुरस् | in front |
| तिरः | तिरस् | and sideways |
| च | च | and |
| तिरस्कृतम् | तिरस्कृत (तिरस्√कृ+क्त, २.१) | was vanquished |
| शीत-रुचा | शीतरुच् (३.१) | by the cool-rayed one (the moon) |
| अन्धकारम् | अन्धकार (२.१) | darkness |
| स्फुट-स्फुटत्-भङ्गि-कच-छलेन | स्फुट–स्फुटत्–भङ्गि–कच–छल (३.१) | under the pretext of her hair with its distinctly breaking curls |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | very |
| पश्चात् | पश्चात् | behind |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| बद्धम् | बद्ध (√बन्ध्+क्त, १.१) | bound |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्या | य | दा | स्ये | न | पु | र | स्ति | र | श्च |
| ति | र | स्कृ | तं | शी | त | रु | चा | न्ध | का | रम् |
| स्फु | ट | स्फु | ट | द्भ | ङ्गि | क | च | च्छ | ले | न |
| त | दे | व | प | श्चा | दि | द | म | स्ति | ब | द्धम् |
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