औज्झि प्रियाङ्गैर्घृणयैव रूक्षा
न वारिदुर्गात्तु वराटकस्य ।
न कण्टकैरावरणाच्च कान्तिः
धूलीभृता काञ्चनकेतकस्य ॥
औज्झि प्रियाङ्गैर्घृणयैव रूक्षा
न वारिदुर्गात्तु वराटकस्य ।
न कण्टकैरावरणाच्च कान्तिः
धूलीभृता काञ्चनकेतकस्य ॥
न वारिदुर्गात्तु वराटकस्य ।
न कण्टकैरावरणाच्च कान्तिः
धूलीभृता काञ्चनकेतकस्य ॥
अन्वयः
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प्रियाङ्गैः रूक्षा (कान्तिः) घृणया एव औज्झि, तु वराटकस्य (कान्तिः) वारिदुर्गात् न (औज्झि)। धूलीभृता काञ्चनकेतकस्य कान्तिः कण्टकैः आवरणात् च न (औज्झि)।
Summary
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Roughness was abandoned by the beloved's limbs out of sheer disgust at its own inferiority. But the lustre of a cowrie shell is not abandoned because of its inaccessibility in water, nor is the beauty of a dust-covered golden Ketaki flower abandoned because it is covered by thorns.
पदच्छेदः
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| औज्झि | औज्झि (√उझ्झ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | Was abandoned |
| प्रियाङ्गैः | प्रिया–अङ्ग (३.३) | by the beloved's limbs |
| घृणया | घृणा (३.१) | out of disgust |
| एव | एव | only |
| रूक्षा | रूक्ष (१.१) | roughness |
| न | न | not |
| वारिदुर्गात् | वारि–दुर्ग (५.१) | because of inaccessibility in water |
| तु | तु | but |
| वराटकस्य | वराटक (६.१) | of a cowrie shell |
| न | न | not |
| कण्टकैः | कण्टक (३.३) | by thorns |
| आवरणात् | आवरण (५.१) | and from being covered |
| च | च | and |
| कान्तिः | कान्ति (१.१) | the beauty |
| धूलीभृता | धूली–भृत् (६.१) | dust-covered |
| काञ्चनकेतकस्य | काञ्चन–केतक (६.१) | of the golden Ketaki flower |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| औ | ज्झि | प्रि | या | ङ्गै | र्घृ | ण | यै | व | रू | क्षा |
| न | वा | रि | दु | र्गा | त्तु | व | रा | ट | क | स्य |
| न | क | ण्ट | कै | रा | व | र | णा | च्च | का | न्तिः |
| धू | ली | भृ | ता | का | ञ्च | न | के | त | क | स्य |
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