श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
गौडर्वीशकुलप्रशस्तिभणितिभ्रातर्ययं तन्महा-
काव्ये चारुणि वैरसेनिचरिते सर्गोऽगमत्सप्तमः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
गौडर्वीशकुलप्रशस्तिभणितिभ्रातर्ययं तन्महा-
काव्ये चारुणि वैरसेनिचरिते सर्गोऽगमत्सप्तमः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
गौडर्वीशकुलप्रशस्तिभणितिभ्रातर्ययं तन्महा-
काव्ये चारुणि वैरसेनिचरिते सर्गोऽगमत्सप्तमः ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्री-हीरः जित-इन्द्रिय-चयं मामल्लदेवी च यं श्री-हर्षं सुतं सुषुवे, गौड-उर्वीश-कुल-प्रशस्ति-भणिति-भ्रातरि तस्य चारुणि वैरसेनि-चरिते महाकाव्ये अयं सप्तमः सर्गः अगमत्।
Summary
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This seventh canto has concluded in this beautiful great poem, the story of Virasena's son (Nala), composed by him (Sriharsha), who is like a brother to the eulogies of the family of the king of Gauda. Srihira, a diamond adorning the crowns of king-poets, and Mamalladevi, who had conquered her senses, gave birth to this son, Sriharsha.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षं | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कवि–राज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | a diamond adorning the crowns of the assembly of king-poets |
| सुतं | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयं | जित–इन्द्रिय–चय (२.१) | who had conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| गौडर्वीशकुलप्रशस्तिभणितिभ्रातरि | गौड–उर्वीश–कुल–प्रशस्ति–भणिति–भ्रातृ (७.१) | in him who is like a brother to the eulogies of the family of the king of Gauda |
| अयं | इदम् (१.१) | this |
| तन्महाकाव्ये | तत्–महाकाव्य (७.१) | in his great poem |
| चारुणि | चारु (७.१) | beautiful |
| वैरसेनिचरिते | वैरसेनि–चरित (७.१) | in the story of Virasena's son (Nala) |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| अगमत् | अगमत् (√गम् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has gone/concluded |
| सप्तमः | सप्तम (१.१) | seventh |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| गौ | ड | र्वी | श | कु | ल | प्र | श | स्ति | भ | णि | ति | भ्रा | त | र्य | यं | त | न्म | हा |
| का | व्ये | चा | रु | णि | वै | र | से | नि | च | रि | ते | स | र्गो | ऽग | म | त्स | प्त | मः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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