रुषारुणा सर्वगुणैर्जयन्त्या
भैम्याः पदं श्रीः स्म विधेर्वृणीते ।
ध्रुवं स तामच्छलयद्यतः सा
भृशारुणैतत्पदभाग्विभाति ॥
रुषारुणा सर्वगुणैर्जयन्त्या
भैम्याः पदं श्रीः स्म विधेर्वृणीते ।
ध्रुवं स तामच्छलयद्यतः सा
भृशारुणैतत्पदभाग्विभाति ॥
भैम्याः पदं श्रीः स्म विधेर्वृणीते ।
ध्रुवं स तामच्छलयद्यतः सा
भृशारुणैतत्पदभाग्विभाति ॥
अन्वयः
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सर्व-गुणैः जयन्त्याः भैम्याः पदं रुषा अरुणा श्रीः विधेः वृणीते स्म। ध्रुवं सः (विधिः) ताम् अच्छलयत्, यतः सा भृश-अरुणा (सती) एतत्-पद-भाक् विभाति।
Summary
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The goddess Shri, red with anger at being surpassed in all qualities by Damayanti, must have sought a place from the creator Brahma. Surely, he deceived her, because she now shines, intensely red, possessing a place on Damayanti's foot (as the red lac dye).
पदच्छेदः
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| रुषा | रुष् (३.१) | with anger |
| अरुणा | अरुण (१.१) | red |
| सर्वगुणैः | सर्व–गुण (३.३) | by all qualities |
| जयन्त्याः | जयन्ती (√जि+शतृ, ६.१) | of the victorious one |
| भैम्याः | भैमी (६.१) | of Damayanti |
| पदं | पद (२.१) | a place |
| श्रीः | श्री (१.१) | the goddess Shri |
| स्म | स्म | (indicates past tense) |
| विधेः | विधि (६.१) | from the Creator (Brahma) |
| वृणीते | वृणीते (√वृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | chooses/begs |
| ध्रुवं | ध्रुवम् | surely |
| सः | तद् (१.१) | he |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| अच्छलयत् | अच्छलयत् (√छल् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | deceived |
| यतः | यतः | because |
| सा | तद् (१.१) | she |
| भृशारुणा | भृश–अरुण (१.१) | intensely red |
| एतत्पदभाक् | एतत्–पद–पदभाज् (√भज्, १.१) | possessing a place on this foot |
| विभाति | विभाति (वि√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shines |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रु | षा | रु | णा | स | र्व | गु | णै | र्ज | य | न्त्या |
| भै | म्याः | प | दं | श्रीः | स्म | वि | धे | र्वृ | णी | ते |
| ध्रु | वं | स | ता | म | च्छ | ल | य | द्य | तः | सा |
| भृ | शा | रु | णै | त | त्प | द | भा | ग्वि | भा | ति |
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