जनैर्विदग्धैर्भवनैश्च मुग्धैः
पदे पदे विस्मयकल्पवल्लीम् ।
तां गाहमानास्य चिरं नलस्य
दृष्टिर्ययौ राजकुलातिथित्वम् ॥
जनैर्विदग्धैर्भवनैश्च मुग्धैः
पदे पदे विस्मयकल्पवल्लीम् ।
तां गाहमानास्य चिरं नलस्य
दृष्टिर्ययौ राजकुलातिथित्वम् ॥
पदे पदे विस्मयकल्पवल्लीम् ।
तां गाहमानास्य चिरं नलस्य
दृष्टिर्ययौ राजकुलातिथित्वम् ॥
अन्वयः
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विदग्धैः जनैः मुग्धैः भवनैः च पदे पदे विस्मय-कल्पवल्लीम् ताम् (पुरीम्) चिरम् गाहमानस्य अस्य नलस्य दृष्टिः राजकुल-आतिथित्वम् ययौ ।
Summary
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As Nala wandered for a long time through that city, which was like a wish-fulfilling creeper of wonder at every step with its clever people and charming mansions, his gaze finally became a guest of the royal palace.
पदच्छेदः
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| जनैः | जन (३.३) | by people |
| विदग्धैः | विदग्ध (वि√दह्+क्त, ३.३) | clever |
| भवनैः | भवन (३.३) | by mansions |
| च | च | and |
| मुग्धैः | मुग्ध (√मुह्+क्त, ३.३) | charming |
| पदे | पद (७.१) | at step |
| पदे | पद (७.१) | at step |
| विस्मयकल्पवल्लीम् | विस्मय–कल्पवल्ली (२.१) | the wish-fulfilling creeper of wonder |
| ताम् | तद् (२.१) | that (city) |
| गाहमानस्य | गाहमान (√गाह्+शानच्, ६.१) | of him who was exploring |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| दृष्टिः | दृष्टि (१.१) | gaze |
| ययौ | ययौ (√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went to |
| राजकुलातिथित्वम् | राजकुल–आतिथित्व (२.१) | the state of being a guest of the royal palace |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | नै | र्वि | द | ग्धै | र्भ | व | नै | श्च | मु | ग्धैः |
| प | दे | प | दे | वि | स्म | य | क | ल्प | व | ल्लीम् |
| तां | गा | ह | मा | ना | स्य | चि | रं | न | ल | स्य |
| दृ | ष्टि | र्य | यौ | रा | ज | कु | ला | ति | थि | त्वम् |
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