इत्युक्तवत्या निहितादरेण
भैम्या गृहीता मघवत्प्रसादः ।
स्रक्पारिजातस्य ऋते नलाशां
वासैरशेषामपुरूपदाशाम् ॥
इत्युक्तवत्या निहितादरेण
भैम्या गृहीता मघवत्प्रसादः ।
स्रक्पारिजातस्य ऋते नलाशां
वासैरशेषामपुरूपदाशाम् ॥
भैम्या गृहीता मघवत्प्रसादः ।
स्रक्पारिजातस्य ऋते नलाशां
वासैरशेषामपुरूपदाशाम् ॥
अन्वयः
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इति उक्तवत्या भैम्या निहितादरेण मघवत्प्रसादः पारिजातस्य स्रक् गृहीता । (सा) नलाशां ऋते अशेषाम् अपुरुषदाशाम् वासैः (सह गृहीतवती) ।
Summary
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After the messenger (Nala) had spoken, Bhaimi, showing respect, accepted Indra's gift—the garland of Parijata flowers. She accepted the entire gift from the god, including the divine clothes, but she did not accept the proposal, holding on to her hope for Nala alone.
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| उक्तवत्या | उक्तवत् (√वच्+क्तवतु, ३.१) | by her who had spoken |
| निहितादरेण | निहित (नि√धा+क्त)–आदर (३.१) | with respect shown |
| भैम्या | भैमी (३.१) | by Bhaimi |
| गृहीता | गृहीत (√ग्रह्+क्त, १.१) | was accepted |
| मघवत्प्रसादः | मघवत्–प्रसाद (१.१) | the gift of Indra |
| स्रक् | स्रज् (१.१) | garland |
| पारिजातस्य | पारिजात (६.१) | of the Parijata tree |
| ऋते | ऋते | without |
| नलाशां | नल–आशा (२.१) | the hope for Nala |
| वासैः | वासस् (३.३) | with the clothes |
| अशेषाम् | अशेष (२.१) | all |
| अपुरूपदाशाम् | अपुरुष–दाशा (२.१) | the gift from the god |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | क्त | व | त्या | नि | हि | ता | द | रे | ण |
| भै | म्या | गृ | ही | ता | म | घ | व | त्प्र | सा | दः |
| स्र | क्पा | रि | जा | त | स्य | ऋ | ते | न | ला | शां |
| वा | सै | र | शे | षा | म | पु | रू | प | दा | शाम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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