यानेव देवान्नमसि त्रिकालं
न तत्कृतघ्नीकृतिरौचिती ते ।
प्रसीद तानप्यनृणान्विधातुं
पतिष्यतस्त्वत्पदयोस्त्रिसंध्यम् ॥
यानेव देवान्नमसि त्रिकालं
न तत्कृतघ्नीकृतिरौचिती ते ।
प्रसीद तानप्यनृणान्विधातुं
पतिष्यतस्त्वत्पदयोस्त्रिसंध्यम् ॥
न तत्कृतघ्नीकृतिरौचिती ते ।
प्रसीद तानप्यनृणान्विधातुं
पतिष्यतस्त्वत्पदयोस्त्रिसंध्यम् ॥
अन्वयः
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यान् देवान् एव त्रिकालम् नमसि, तेषाम् कृतघ्नीकृतिः ते औचिती न (अस्ति) । त्रिसंध्यम् त्वत्पदयोः पतिष्यतः तान् अपि अनृणान् विधातुम् प्रसीद ।
Summary
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"It is not proper for you to be ungrateful to those very gods whom you worship three times a day. Be pleased, and thus make them free from their debt to you, as they will in turn be falling at your feet three times a day."
पदच्छेदः
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| यान् | यद् (२.३) | which |
| एव | एव | very |
| देवान् | देव (२.३) | gods |
| नमसि | नमसि (√नम् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you bow to |
| त्रिकालम् | त्रिकालम् | three times a day |
| न | न | not |
| तत्कृतघ्नीकृतिः | तद्–कृतघ्नीकृति (१.१) | the act of being ungrateful to them |
| औचिती | औचिती (१.१) | propriety |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| प्रसीद | प्रसीद (प्र√सद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | be pleased |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| अपि | अपि | also |
| अनृणान् | अनृण (२.३) | free from debt |
| विधातुम् | विधातुम् (वि√धा+तुमुन्) | to make |
| पतिष्यतः | पतिष्यत् (√पत्+स्य+शतृ, २.३) | who will be falling |
| त्वत्पदयोः | त्वद्–पद (७.२) | at your feet |
| त्रिसंध्यम् | त्रिसंध्यम् | at the three junctures of the day |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | ने | व | दे | वा | न्न | म | सि | त्रि | का | लं |
| न | त | त्कृ | त | घ्नी | कृ | ति | रौ | चि | ती | ते |
| प्र | सी | द | ता | न | प्य | नृ | णा | न्वि | धा | तुं |
| प | ति | ष्य | त | स्त्व | त्प | द | यो | स्त्रि | सं | ध्यम् |
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