पदं शतेनाप मखैर्यदिन्द्रः
तस्मै स ते याचनचाटुकारः ।
कुरु प्रसादं तदलंकुरुष्व
स्वीकारकृद्भ्रूनटनश्रमेण ॥
पदं शतेनाप मखैर्यदिन्द्रः
तस्मै स ते याचनचाटुकारः ।
कुरु प्रसादं तदलंकुरुष्व
स्वीकारकृद्भ्रूनटनश्रमेण ॥
तस्मै स ते याचनचाटुकारः ।
कुरु प्रसादं तदलंकुरुष्व
स्वीकारकृद्भ्रूनटनश्रमेण ॥
अन्वयः
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इन्द्रः शतेन मखैः यत् पदम् आप, सः ते याचनचाटुकारः (अस्ति) । तस्मै प्रसादम् कुरु । तत् स्वीकारकृत्-भ्रूनटन-श्रमेण अलंकुरुष्व ।
Summary
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"That very position which Indra obtained by performing a hundred sacrifices—he now comes to you as a flattering supplicant. Therefore, do him a favor. Grace him with the slight effort of the dance of your eyebrows, signifying your acceptance."
पदच्छेदः
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| पदम् | पद (२.१) | the position |
| शतेन | शत (३.१) | by a hundred |
| आप | आप (√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| मखैः | मख (३.३) | sacrifices |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| इन्द्रः | इन्द्र (१.१) | Indra |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him |
| सः | तद् (१.१) | he |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| याचनचाटुकारः | याचन–चाटुकार (१.१) | a flatterer in begging |
| कुरु | कुरु (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| प्रसादम् | प्रसाद (२.१) | favor |
| तत् | तत् | therefore |
| अलंकुरुष्व | अलंकुरुष्व (अलम्√कृ कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | adorn |
| स्वीकारकृद्भ्रूनटनश्रमेण | स्वीकार–कृत्–भ्रू–नटन–श्रम (३.१) | by the effort of the dance of your eyebrows that signifies acceptance |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | दं | श | ते | ना | प | म | खै | र्य | दि | न्द्रः |
| त | स्मै | स | ते | या | च | न | चा | टु | का | रः |
| कु | रु | प्र | सा | दं | त | द | लं | कु | रु | ष्व |
| स्वी | का | र | कृ | द्भ्रू | न | ट | न | श्र | मे | ण |
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