यः प्रेर्यमाणोऽपि हृदा मघोनः
त्वदर्थनायां ह्रियमापदागः ।
स्वयंवरस्थानजुषस्तमस्य
बधान कण्ठं वरणस्रजाशु ॥
यः प्रेर्यमाणोऽपि हृदा मघोनः
त्वदर्थनायां ह्रियमापदागः ।
स्वयंवरस्थानजुषस्तमस्य
बधान कण्ठं वरणस्रजाशु ॥
त्वदर्थनायां ह्रियमापदागः ।
स्वयंवरस्थानजुषस्तमस्य
बधान कण्ठं वरणस्रजाशु ॥
अन्वयः
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यः मघोनः हृदा प्रेर्यमाणः अपि त्वदर्थनायाम् ह्रियम् आपत्, सः आगः । अस्य स्वयंवरस्थानजुषः तम् कण्ठम् वरणस्रजा आशु बधान ।
Summary
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"Indra, who, though urged by his heart, felt shy in requesting you, has now come. Quickly bind the neck of this one, who is present here in the svayamvara hall, with the garland of choice."
पदच्छेदः
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| यः | यद् (१.१) | who |
| प्रेर्यमाणः | प्रेर्यमाण (प्र√ईर्+यक्+शानच्, १.१) | being urged |
| अपि | अपि | even |
| हृदा | हृद् (३.१) | by the heart |
| मघोनः | मघवन् (६.१) | Indra |
| त्वदर्थनायाम् | त्वद्–अर्थना (७.१) | in requesting you |
| ह्रियम् | ह्री (२.१) | shyness |
| आपत् | आपत् (√आप् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| आगः | आगः (आ√गा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has come |
| स्वयंवरस्थानजुषः | स्वयंवर–स्थान–जुष् (६.१) | of him who is present in the svayamvara hall |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| बधान | बधान (√बन्ध् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | bind |
| कण्ठम् | कण्ठ (२.१) | neck |
| वरणस्रजा | वरण–स्रज् (३.१) | with the garland of choice |
| आशु | आशु | quickly |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यः | प्रे | र्य | मा | णो | ऽपि | हृ | दा | म | घो | नः |
| त्व | द | र्थ | ना | यां | ह्रि | य | मा | प | दा | गः |
| स्व | यं | व | र | स्था | न | जु | ष | स्त | म | स्य |
| ब | धा | न | क | ण्ठं | व | र | ण | स्र | जा | शु |
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