लिपिर्न दैवी सुपठा भुवीति
तुभ्यं मयि प्रेषितवाचिकस्य ।
इन्द्रस्य दूत्यां रचय प्रसादं
विज्ञापयन्त्यामवधानदानैः ॥
लिपिर्न दैवी सुपठा भुवीति
तुभ्यं मयि प्रेषितवाचिकस्य ।
इन्द्रस्य दूत्यां रचय प्रसादं
विज्ञापयन्त्यामवधानदानैः ॥
तुभ्यं मयि प्रेषितवाचिकस्य ।
इन्द्रस्य दूत्यां रचय प्रसादं
विज्ञापयन्त्यामवधानदानैः ॥
अन्वयः
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'दैवी लिपिः भुवि न सुपठा' इति तुभ्यम् मयि वाचिकम् प्रेषितवतः इन्द्रस्य दूत्याम् विज्ञापयन्त्याम् मयि अवधानदानैः प्रसादम् रचय ।
Summary
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Nala, as the messenger, says: "Thinking that the divine script is not easily readable on earth, Indra sent a verbal message through me to you. Please do me, his messenger who is making this request, the favor of giving your attention."
पदच्छेदः
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| लिपिः | लिपि (१.१) | script |
| न | न | not |
| दैवी | दैवी (१.१) | divine |
| सुपठा | सुपठ (१.१) | easily readable |
| भुवि | भू (७.१) | on earth |
| इति | इति | thinking thus |
| तुभ्यम् | युष्मद् (४.१) | to you |
| मयि | अस्मद् (७.१) | through me |
| प्रेषितवाचिकस्य | प्रेषितवत् (प्र√इष्+क्तवतु)–वाचिक (६.१) | of him who sent a verbal message |
| इन्द्रस्य | इन्द्र (६.१) | of Indra |
| दूत्याम् | दूती (७.१) | in me, the messenger |
| रचय | रचय (√रच् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| प्रसादम् | प्रसाद (२.१) | favor |
| विज्ञापयन्त्याम् | विज्ञापयन्ती (वि√ज्ञा+णिच्+शतृ, ७.१) | in me who is requesting |
| अवधानदानैः | अवधान–दान (३.३) | by giving attention |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लि | पि | र्न | दै | वी | सु | प | ठा | भु | वी | ति |
| तु | भ्यं | म | यि | प्रे | षि | त | वा | चि | क | स्य |
| इ | न्द्र | स्य | दू | त्यां | र | च | य | प्र | सा | दं |
| वि | ज्ञा | प | य | न्त्या | म | व | धा | न | दा | नैः |
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