स्मराशुगीभूय विदर्भसुभ्रु-
वक्षो यदक्षभि खलु प्रसूनैः ।
स्रजं सृजन्त्या तदशोधि तेषु
यत्रैकया सूचिशिखां निखाय ॥
स्मराशुगीभूय विदर्भसुभ्रु-
वक्षो यदक्षभि खलु प्रसूनैः ।
स्रजं सृजन्त्या तदशोधि तेषु
यत्रैकया सूचिशिखां निखाय ॥
वक्षो यदक्षभि खलु प्रसूनैः ।
स्रजं सृजन्त्या तदशोधि तेषु
यत्रैकया सूचिशिखां निखाय ॥
अन्वयः
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यत्र स्रजम् सृजन्त्या एकया, प्रसूनैः स्मर-आशुगी-भूय विदर्भ-सुभ्रु-वक्षः यत् अक्षिपत् खलु, तत् तेषु सूचि-शिखाम् निखाय अशोधि।
Summary
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There, a friend was making a garland. Because the flowers she was using had, like Kama's arrows, struck Damayanti's heart, another friend rectified this by piercing those flowers with the point of a needle.
पदच्छेदः
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| स्मर-आशुगी-भूय | स्मर–आशुग–आशुगीभूय (√भू+च्वि+ल्यप्) | having become Kama's arrows |
| विदर्भ-सुभ्रु-वक्षः | विदर्भ–सुभ्रू–वक्षस् (२.१) | the chest of the beautiful-browed daughter of Vidarbha |
| यत् | यद् (२.१) | because |
| अक्षिपत् | अक्षिपत् (√क्षिप् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | it struck |
| खलु | खलु | indeed |
| प्रसूनैः | प्रसून (३.३) | the flowers |
| स्रजम् | स्रज् (२.१) | a garland |
| सृजन्त्या | सृजन्ती (√सृज्+शतृ+ङीप्, ३.१) | by one who was making |
| तत् | तद् (१.१) | that (act) |
| अशोधि | अशोधि (√शुध् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was rectified |
| तेषु | तद् (७.३) | in them (the flowers) |
| यत्र | यत्र | where |
| एकया | एक (३.१) | by one (friend) |
| सूचि-शिखाम् | सूचि–शिखा (२.१) | the point of a needle |
| निखाय | निखाय (नि√खन्+ल्यप्) | having inserted |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | रा | शु | गी | भू | य | वि | द | र्भ | सु | भ्रु |
| व | क्षो | य | द | क्ष | भि | ख | लु | प्र | सू | नैः |
| स्र | जं | सृ | ज | न्त्या | त | द | शो | धि | ते | षु |
| य | त्रै | क | या | सू | चि | शि | खां | नि | खा | य |
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