स्विद्यत्प्रमोदाश्रुलवेन वामं
रोमाञ्चभृत्पक्ष्मभिरस्य चक्षुः ।
अन्यत्पुनः कम्प्रमपि स्फुरत्त्वा-
त्तस्याः पुरः प्राप नवोपभोगम् ॥
स्विद्यत्प्रमोदाश्रुलवेन वामं
रोमाञ्चभृत्पक्ष्मभिरस्य चक्षुः ।
अन्यत्पुनः कम्प्रमपि स्फुरत्त्वा-
त्तस्याः पुरः प्राप नवोपभोगम् ॥
रोमाञ्चभृत्पक्ष्मभिरस्य चक्षुः ।
अन्यत्पुनः कम्प्रमपि स्फुरत्त्वा-
त्तस्याः पुरः प्राप नवोपभोगम् ॥
अन्वयः
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अस्य वामम् चक्षुः स्विद्यत्-प्रमोद-अश्रु-लवेन रोमाञ्चभृत्-पक्ष्मभिः (युक्तं सत्) । अन्यत् पुनः कम्प्रम् अपि स्फुरत्त्वात् तस्याः पुरः नव-उपभोगम् प्राप ।
Summary
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His left eye, with its bristling lashes, experienced a new delight from the drops of joyful tears, while his other eye, though trembling, also experienced a new pleasure in front of her city due to its throbbing (a good omen).
पदच्छेदः
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| स्विद्यत्प्रमोदाश्रुलवेन | स्विद्यत्–प्रमोद–अश्रु–लव (३.१) | with a drop of sweat-like tear of joy |
| वामम् | वाम (१.१) | left |
| रोमाञ्चभृत्पक्ष्मभिः | रोमाञ्च–भृत्–पक्ष्मन् (३.३) | with lashes bristling with horripilation |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| चक्षुः | चक्षुस् (१.१) | eye |
| अन्यत् | अन्य (१.१) | the other |
| पुनः | पुनर् | again |
| कम्प्रम् | कम्प्र (१.१) | trembling |
| अपि | अपि | also |
| स्फुरत्त्वात् | स्फुरत्त्व (५.१) | due to throbbing |
| तस्याः | तद् (६.१) | of her |
| पुरः | पुरस् | in front |
| प्राप | प्राप (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attained |
| नवोभोगम् | नव–उपभोग (२.१) | a new enjoyment |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वि | द्य | त्प्र | मो | दा | श्रु | ल | वे | न | वा | मं |
| रो | मा | ञ्च | भृ | त्प | क्ष्म | भि | र | स्य | च | क्षुः |
| अ | न्य | त्पु | नः | क | म्प्र | म | पि | स्फु | र | त्त्वा |
| त्त | स्याः | पु | रः | प्रा | प | न | वो | प | भो | गम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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