परस्परस्पर्शरसोर्मिसेका-
त्तयोः क्षणं चेतसि विप्रलम्भः ।
स्नेहातिदानादिव दीपिकार्चिः
निमिष्य किंचिद्द्विगुणं दिदीपे ॥
परस्परस्पर्शरसोर्मिसेका-
त्तयोः क्षणं चेतसि विप्रलम्भः ।
स्नेहातिदानादिव दीपिकार्चिः
निमिष्य किंचिद्द्विगुणं दिदीपे ॥
त्तयोः क्षणं चेतसि विप्रलम्भः ।
स्नेहातिदानादिव दीपिकार्चिः
निमिष्य किंचिद्द्विगुणं दिदीपे ॥
अन्वयः
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परस्पर-स्पर्श-रस-ऊर्मि-सेकात् तयोः चेतसि विप्रलम्भः स्नेहातिदानात् दीपिका-अर्चिः इव क्षणम् किंचित् निमिष्य द्विगुणम् दिदीपे।
Summary
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Due to the sprinkling by the waves of pleasure from their mutual touch, the feeling of separation in their minds, like a lamp's flame from an oversupply of oil (love), flickered for a moment and then shone twice as brightly.
पदच्छेदः
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| परस्पर-स्पर्श-रस-ऊर्मि-सेकात् | परस्पर–स्पर्श–रस–ऊर्मि–सेक (५.१) | from the sprinkling by the waves of pleasure from mutual touch |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| क्षणम् | क्षण (२.१) | for a moment |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the mind |
| विप्रलम्भः | विप्रलम्भ (१.१) | the feeling of separation |
| स्नेहातिदानात् | स्नेह–अतिदान (५.१) | from an excessive supply of oil (love) |
| इव | इव | like |
| दीपिका-अर्चिः | दीपिका–अर्चिस् (१.१) | the flame of a lamp |
| निमिष्य | निमिष्य (नि√मिष्+ल्यप्) | having flickered |
| किंचित् | किंचित् | a little |
| द्विगुणम् | द्विगुण (२.१) | twice as much |
| दिदीपे | दिदीपे (√दीप् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | र | स्प | र | स्प | र्श | र | सो | र्मि | से | का |
| त्त | योः | क्ष | णं | चे | त | सि | वि | प्र | ल | म्भः |
| स्ने | हा | ति | दा | ना | दि | व | दी | पि | का | र्चिः |
| नि | मि | ष्य | किं | चि | द्द्वि | गु | णं | दि | दी | पे |
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