पुंसि स्वभर्तृव्यतिरिक्तभूते
भूत्वाप्यनीक्षानियमव्रतिन्यः ।
छायासु रूपं भुवि वीक्ष्य तस्य
फलं दृशोरानशिरे महिष्यः ॥
पुंसि स्वभर्तृव्यतिरिक्तभूते
भूत्वाप्यनीक्षानियमव्रतिन्यः ।
छायासु रूपं भुवि वीक्ष्य तस्य
फलं दृशोरानशिरे महिष्यः ॥
भूत्वाप्यनीक्षानियमव्रतिन्यः ।
छायासु रूपं भुवि वीक्ष्य तस्य
फलं दृशोरानशिरे महिष्यः ॥
अन्वयः
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स्व-भर्तृ-व्यतिरिक्त-भूते पुंसि अनीक्षा-नियम-व्रतिन्यः भूत्वा अपि महिष्यः भुवि छायासु तस्य रूपम् वीक्ष्य दृशोः फलम् आनशिरे ।
Summary
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Although the queens observed a vow of not looking at any man other than their own husband, they still obtained the fruit of their eyes by seeing his form in his shadow on the ground.
पदच्छेदः
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| पुंसि | पुंस् (७.१) | towards a man |
| स्व | स्व | own |
| भर्तृ | भर्तृ | husband |
| व्यतिरिक्त | व्यतिरिक्त (वि+अति√रिच्+क्त) | other than |
| भूते | भूत (√भू+क्त, ७.१) | being |
| भूत्वा | भूत्वा (√भू+क्त्वा) | having been |
| अपि | अपि | even though |
| अनीक्षा | अनीक्षा | not looking |
| नियम | नियम | rule |
| व्रतिन्यः | व्रतिन् (१.३) | observing the vow of |
| छायासु | छाया (७.३) | in the shadows |
| रूपम् | रूप (२.१) | form |
| भुवि | भू (७.१) | on the ground |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| फलम् | फल (२.१) | the fruit |
| दृशोः | दृश् (६.२) | of their two eyes |
| आनशिरे | आनशिरे (√अश् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | obtained |
| महिष्यः | महिषी (१.३) | the queens |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पुं | सि | स्व | भ | र्तृ | व्य | ति | रि | क्त | भू | ते |
| भू | त्वा | प्य | नी | क्षा | नि | य | म | व्र | ति | न्यः |
| छा | या | सु | रू | पं | भु | वि | वी | क्ष्य | त | स्य |
| फ | लं | दृ | शो | रा | न | शि | रे | म | हि | ष्यः |
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