पुरःस्थितस्य क्वचिदस्य भूषा-
रत्नेषु नार्यः प्रतिबिम्बितानि ।
व्योमन्यदृश्येषु निजान्यपश्य-
न्विस्मित्य विस्मित्य सहस्रकृत्वः ॥
पुरःस्थितस्य क्वचिदस्य भूषा-
रत्नेषु नार्यः प्रतिबिम्बितानि ।
व्योमन्यदृश्येषु निजान्यपश्य-
न्विस्मित्य विस्मित्य सहस्रकृत्वः ॥
रत्नेषु नार्यः प्रतिबिम्बितानि ।
व्योमन्यदृश्येषु निजान्यपश्य-
न्विस्मित्य विस्मित्य सहस्रकृत्वः ॥
अन्वयः
AI
क्वचित् पुरः-स्थितस्य अस्य भूषा-रत्नेषु प्रतिबिम्बितानि निजानि (प्रतिबिम्बानि) व्योमनि अदृश्येषु (देवेषु स्थितानि इव) नार्यः विस्मित्य विस्मित्य सहस्रकृत्वः अपश्यन् ।
Summary
AI
Women saw their own reflections in the jewels of his ornaments as he stood before them. Thinking these reflections were of themselves amidst the invisible gods in the sky, they looked on, astonished again and again, a thousand times.
पदच्छेदः
AI
| पुरः | पुरस् | in front |
| स्थितस्य | स्थित (√स्था+क्त, ६.१) | of him standing |
| क्वचित् | क्वचित् | somewhere |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| भूषा | भूषा | ornament |
| रत्नेषु | रत्न (७.३) | in the jewels of |
| नार्यः | नारी (१.३) | women |
| प्रतिबिम्बितानि | प्रतिबिम्बित (प्रति√बिम्ब्+क्त, २.३) | reflected images |
| व्योमनि | व्योमन् (७.१) | in the sky |
| अदृश्येषु | अदृश्य (७.३) | among the invisible ones |
| निजानि | निज (२.३) | their own |
| अपश्यन् | अपश्यन् (√दृश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | saw |
| विस्मित्य | विस्मित्य (वि√स्मि+ल्यप्) | being astonished |
| विस्मित्य | विस्मित्य (वि√स्मि+ल्यप्) | being astonished |
| सहस्रकृत्वः | सहस्रकृत्वस् | a thousand times |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रः | स्थि | त | स्य | क्व | चि | द | स्य | भू | षा |
| र | त्ने | षु | ना | र्यः | प्र | ति | बि | म्बि | ता | नि |
| व्यो | म | न्य | दृ | श्ये | षु | नि | जा | न्य | प | श्य |
| न्वि | स्मि | त्य | वि | स्मि | त्य | स | ह | स्र | कृ | त्वः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.