तारुण्यपुण्यामवलोकयन्त्योः
अन्योन्यमेणेक्षणयोरभिख्याम् ।
मध्ये मुहूर्तं स बभूव गच्छ-
न्नाकस्मिकाच्छादनविस्मयाय ॥
तारुण्यपुण्यामवलोकयन्त्योः
अन्योन्यमेणेक्षणयोरभिख्याम् ।
मध्ये मुहूर्तं स बभूव गच्छ-
न्नाकस्मिकाच्छादनविस्मयाय ॥
अन्योन्यमेणेक्षणयोरभिख्याम् ।
मध्ये मुहूर्तं स बभूव गच्छ-
न्नाकस्मिकाच्छादनविस्मयाय ॥
अन्वयः
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अन्योन्यम् तारुण्य-पुण्याम् अभिख्याम् अवलोकयन्त्योः एणेक्षणयोः मध्ये गच्छन् सः मुहूर्तम् आकस्मिक-आच्छादन-विस्मयाय बभूव ।
Summary
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As two deer-eyed women were gazing at each other's beauty, made sacred by youth, he (Nala), while passing between them, became for a moment the cause of their astonishment by suddenly obscuring their view.
पदच्छेदः
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| तारुण्य | तारुण्य | youth |
| पुण्याम् | पुण्य (२.१) | made holy by |
| अवलोकयन्त्योः | अवलोकयन्ती (अव√लोक्+णिच्+शतृ, ६.२) | of the two looking |
| अन्योन्यम् | अन्योन्यम् | at each other |
| एणेक्षणयोः | एणेक्षणा (६.२) | of the two deer-eyed women |
| अभिख्याम् | अभिख्या (२.१) | beauty |
| मध्ये | मध्ये | in between |
| मुहूर्तम् | मुहूर्त (२.१) | for a moment |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| गच्छन् | गच्छत् (√गम्+शतृ, १.१) | going |
| आकस्मिक | आकस्मिक | sudden |
| आच्छादन | आच्छादन | covering |
| विस्मयाय | विस्मय (४.१) | for the astonishment of |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | रु | ण्य | पु | ण्या | म | व | लो | क | य | न्त्योः |
| अ | न्यो | न्य | मे | णे | क्ष | ण | यो | र | भि | ख्याम् |
| म | ध्ये | मु | हू | र्तं | स | ब | भू | व | ग | च्छ |
| न्ना | क | स्मि | का | च्छा | द | न | वि | स्म | या | य |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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