उल्लिख्य हंसेन दले नलिन्याः
तस्मै यथादर्शि तथैव भैमी ।
तेनाभिलिख्योपहृतस्वहारा
कस्या न दृष्टाजनि विस्मयाय ॥
उल्लिख्य हंसेन दले नलिन्याः
तस्मै यथादर्शि तथैव भैमी ।
तेनाभिलिख्योपहृतस्वहारा
कस्या न दृष्टाजनि विस्मयाय ॥
तस्मै यथादर्शि तथैव भैमी ।
तेनाभिलिख्योपहृतस्वहारा
कस्या न दृष्टाजनि विस्मयाय ॥
अन्वयः
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हंसेन नलिन्याः दले उल्लिख्य भैमी तस्मै यथा अदर्शि, तथा एव तेन अभिलिख्य उपहृत-स्व-हारा (भैमी) दृष्टा (सती) कस्याः विस्मयाय न अजनि?
Summary
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Just as Damayanti was shown to Nala sketched by the swan on a lotus leaf, so too, when he drew her and offered his own necklace to the portrait, who among the women who saw it was not filled with astonishment?
पदच्छेदः
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| उल्लिख्य | उल्लिख्य (उद्√लिख्+ल्यप्) | having sketched |
| हंसेन | हंस (३.१) | by the swan |
| दले | दल (७.१) | on a leaf |
| नलिन्याः | नलिनी (६.१) | of a lotus |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him |
| यथा | यथा | as |
| अदर्शि | अदर्शि (√दृश् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was shown |
| तथा | तथा | so |
| एव | एव | indeed |
| भैमी | भैमी (१.१) | Bhaimi |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| अभिलिख्य | अभिलिख्य (अभि√लिख्+ल्यप्) | having drawn |
| उपहृत | उपहृत (उप√हृ+क्त) | offered |
| स्व | स्व | his own |
| हारा | हार (१.१) | to whom a necklace |
| कस्याः | किम् (६.१) | to whom |
| न | न | not |
| दृष्टा | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | seen |
| अजनि | अजनि (√जन् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | did become |
| विस्मयाय | विस्मय (४.१) | for astonishment |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | ल्लि | ख्य | हं | से | न | द | ले | न | लि | न्याः |
| त | स्मै | य | था | द | र्शि | त | थै | व | भै | मी |
| ते | ना | भि | लि | ख्यो | प | हृ | त | स्व | हा | रा |
| क | स्या | न | दृ | ष्टा | ज | नि | वि | स्म | या | य |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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