जागर्ति तच्छायदृशां पुरा यः
स्पृष्टे च तस्मिन्विससर्प कम्पः ।
द्रुते द्रुतं तत्पदशब्दभीत्या
स्वहस्तितश्चारुदृशां परं सः ॥
जागर्ति तच्छायदृशां पुरा यः
स्पृष्टे च तस्मिन्विससर्प कम्पः ।
द्रुते द्रुतं तत्पदशब्दभीत्या
स्वहस्तितश्चारुदृशां परं सः ॥
स्पृष्टे च तस्मिन्विससर्प कम्पः ।
द्रुते द्रुतं तत्पदशब्दभीत्या
स्वहस्तितश्चारुदृशां परं सः ॥
अन्वयः
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यः कम्पः पुरा तत्-छाय-दृशाम् जागर्ति, सः तस्मिन् स्पृष्टे च विससर्प । द्रुते (सति) तत्-पद-शब्द-भीत्या सः (कम्पः) चारु-दृशाम् स्व-हस्तितः परम् द्रुतम् (विससर्प) ।
Summary
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The trembling that previously arose in the women who saw his shadow spread through them when he was touched. When he moved quickly, that same trembling, out of fear of his footsteps, spread even more quickly, but only from their own hands.
पदच्छेदः
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| जागर्ति | जागर्ति (√जागृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is awake |
| तत् | तद् | his |
| छाय | छाया | shadow |
| दृशाम् | दृश् (६.३) | of those who see |
| पुरा | पुरा | before |
| यः | यद् (१.१) | which |
| स्पृष्टे | स्पृष्ट (√स्पृश्+क्त, ७.१) | when touched |
| च | च | and |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in him |
| विससर्प | विससर्प (वि√सृप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spread |
| कम्पः | कम्प (१.१) | trembling |
| द्रुते | द्रुत (√द्रु+क्त, ७.१) | when he moved quickly |
| द्रुतम् | द्रुतम् | quickly |
| तत् | तद् | his |
| पद | पद | footstep |
| शब्द | शब्द | sound |
| भीत्या | भीति (३.१) | out of fear of |
| स्व | स्व | their own |
| हस्तितः | हस्तित (५.१) | from the hands |
| चारु | चारु | beautiful |
| दृशाम् | दृश् (६.३) | of the eyed women |
| परम् | परम् | only |
| सः | तद् (१.१) | that |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जा | ग | र्ति | त | च्छा | य | दृ | शां | पु | रा | यः |
| स्पृ | ष्टे | च | त | स्मि | न्वि | स | स | र्प | क | म्पः |
| द्रु | ते | द्रु | तं | त | त्प | द | श | ब्द | भी | त्या |
| स्व | ह | स्ति | त | श्चा | रु | दृ | शां | प | रं | सः |
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