हतः कयाचित्पथि कन्दुकेन
संघट्ट्य भिन्नः करजैः कयापि ।
कयाचनाक्तः कुचकुङ्कुमेन
संभुक्तकल्पः स बभूव ताभिः ॥
हतः कयाचित्पथि कन्दुकेन
संघट्ट्य भिन्नः करजैः कयापि ।
कयाचनाक्तः कुचकुङ्कुमेन
संभुक्तकल्पः स बभूव ताभिः ॥
संघट्ट्य भिन्नः करजैः कयापि ।
कयाचनाक्तः कुचकुङ्कुमेन
संभुक्तकल्पः स बभूव ताभिः ॥
अन्वयः
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सः पथि कयाचित् कन्दुकेन हतः, कया अपि संघट्ट्य करजैः भिन्नः, कयाचन कुचकुङ्कुमेन आक्तः (सन्) ताभिः संभुक्तकल्पः बभूव।
Summary
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On the path, he was struck with a ball by one woman, scratched with fingernails by another upon collision, and smeared with saffron from the breasts of yet another. Thus, he was as if he had been carnally enjoyed by them.
पदच्छेदः
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| हतः | हत (√हन्+क्त, १.१) | struck |
| कयाचित् | किञ्चित् (३.१) | by some woman |
| पथि | पथिन् (७.१) | on the path |
| कन्दुकेन | कन्दुक (३.१) | with a ball |
| संघट्ट्य | संघट्ट्य (सम्√घट्ट्+ल्यप्) | having collided |
| भिन्नः | भिन्न (√भिद्+क्त, १.१) | scratched |
| करजैः | करज (३.३) | with fingernails |
| कया | किम् (३.१) | by some |
| अपि | अपि | also |
| कयाचन | किञ्चन (३.१) | by another |
| आक्तः | आक्त (√अञ्ज्+क्त, १.१) | smeared |
| कुचकुङ्कुमेन | कुच–कुङ्कुम (३.१) | with the saffron from the breasts |
| संभुक्तकल्पः | संभुक्त–कल्प (१.१) | almost enjoyed |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| ताभिः | तद् (३.३) | by them |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | तः | क | या | चि | त्प | थि | क | न्दु | के | न |
| सं | घ | ट्ट्य | भि | न्नः | क | र | जैः | क | या | पि |
| क | या | च | ना | क्तः | कु | च | कु | ङ्कु | मे | न |
| सं | भु | क्त | क | ल्पः | स | ब | भू | व | ता | भिः |
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