तन्वीमुखं द्रागधिगत्य चन्द्रं
वियोगिनस्तस्य मिमीलिताभ्याम् ।
द्वयं द्रढीयः कृतमीक्षणाभ्यां
तदिन्दुता च स्वसरोजता च ॥
तन्वीमुखं द्रागधिगत्य चन्द्रं
वियोगिनस्तस्य मिमीलिताभ्याम् ।
द्वयं द्रढीयः कृतमीक्षणाभ्यां
तदिन्दुता च स्वसरोजता च ॥
वियोगिनस्तस्य मिमीलिताभ्याम् ।
द्वयं द्रढीयः कृतमीक्षणाभ्यां
तदिन्दुता च स्वसरोजता च ॥
अन्वयः
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वियोगिनः तस्य ईक्षणाभ्याम् तन्वीमुखम् चन्द्रम् द्राक् अधिगत्य मिमीलिताभ्याम् (सताभ्याम्), तत् इन्दुता च स्वसरोजता च द्वयम् द्रढीयः कृतम्।
Summary
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His eyes, belonging to a separated lover, quickly perceived the slender woman's face as the moon and closed. By this act of closing, two things were confirmed: the moon-ness of her face (as moons cause lotuses to close) and their own lotus-ness.
पदच्छेदः
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| तन्वीमुखम् | तन्वी–मुख (२.१) | the face of the slender woman |
| द्राक् | द्राक् | quickly |
| अधिगत्य | अधिगत्य (अधि√गम्+ल्यप्) | having perceived |
| चन्द्रम् | चन्द्र (२.१) | as the moon |
| वियोगिनः | वियोगिन् (६.१) | of the separated lover |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| मिमीलिताभ्याम् | मिमीलित (√मील्+क्त, ३.२) | by the two closed (eyes) |
| द्वयम् | द्वय (१.१) | a pair |
| द्रढीयः | द्रढीयस् (√दृढ+ईयसुन्, १.१) | firmer |
| कृतम् | कृत (√कृ+क्त, १.१) | was made |
| ईक्षणाभ्याम् | ईक्षण (३.२) | by his two eyes |
| तत् | तद् | that |
| इन्दुता | इन्दु–ता (१.१) | the state of being the moon |
| च | च | and |
| स्वसरोजता | स्व–सरोज–ता (१.१) | their own state of being lotuses |
| च | च | and |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | न्वी | मु | खं | द्रा | ग | धि | ग | त्य | च | न्द्रं |
| वि | यो | गि | न | स्त | स्य | मि | मी | लि | ता | भ्याम् |
| द्व | यं | द्र | ढी | यः | कृ | त | मी | क्ष | णा | भ्यां |
| त | दि | न्दु | ता | च | स्व | स | रो | ज | ता | च |
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