उद्वर्तयन्त्या हृदये निपत्य
नृपस्य दृष्टिर्न्यवृतद्द्रुतैव ।
वियोगिवैरात्कुचयोर्नखाङ्कैः
अर्धेन्दुलीलैर्गलहस्ततेव ॥
उद्वर्तयन्त्या हृदये निपत्य
नृपस्य दृष्टिर्न्यवृतद्द्रुतैव ।
वियोगिवैरात्कुचयोर्नखाङ्कैः
अर्धेन्दुलीलैर्गलहस्ततेव ॥
नृपस्य दृष्टिर्न्यवृतद्द्रुतैव ।
वियोगिवैरात्कुचयोर्नखाङ्कैः
अर्धेन्दुलीलैर्गलहस्ततेव ॥
अन्वयः
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उद्वर्तयन्त्याः कुचयोः हृदये निपत्य नृपस्य दृष्टिः, वियोगिवैरात् अर्धेन्दुलीलैः नखाङ्कैः गलहस्तता इव, द्रुता एव न्यवृतत्।
Summary
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The king's gaze, having fallen upon the chest of a woman anointing her body, quickly turned back, as if thrown out by the neck by the crescent-moon-shaped nail marks on her breasts, which seemed to bear enmity towards separated lovers.
पदच्छेदः
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| उद्वर्तयन्त्याः | उद्वर्तयन्ती (उद्√वृत्+णिच्+शतृ, ६.१) | of her who was anointing her body |
| हृदये | हृदय (७.१) | on the chest |
| निपत्य | निपत्य (नि√पत्+ल्यप्) | having fallen |
| नृपस्य | नृप (६.१) | of the king |
| दृष्टिः | दृष्टि (१.१) | gaze |
| न्यवृतत् | न्यवृतत् (नि√वृत् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | turned back |
| द्रुता | द्रुत (१.१) | quickly |
| एव | एव | indeed |
| वियोगिवैरात् | वियोगिन्–वैर (५.१) | due to enmity with separated lovers |
| कुचयोः | कुच (६.२) | of the two breasts |
| नखाङ्कैः | नख–अङ्क (३.३) | by the nail marks |
| अर्धेन्दुलीलैः | अर्ध–इन्दु–लीला (३.३) | resembling crescent moons |
| गलहस्तता | गल–हस्तता (१.१) | the act of being seized by the neck |
| इव | इव | as if |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द्व | र्त | य | न्त्या | हृ | द | ये | नि | प | त्य |
| नृ | प | स्य | दृ | ष्टि | र्न्य | वृ | त | द्द्रु | तै | व |
| वि | यो | गि | वै | रा | त्कु | च | यो | र्न | खा | ङ्कैः |
| अ | र्धे | न्दु | ली | लै | र्ग | ल | ह | स्त | ते | व |
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