प्रियां विकल्पोपहृतां स याव-
द्दिगीशसंदेशमजल्पदल्पम् ।
अदृश्यवाग्भीषितभूरिभीरु-
भवो रवस्तावदचेतयत्तम् ॥
प्रियां विकल्पोपहृतां स याव-
द्दिगीशसंदेशमजल्पदल्पम् ।
अदृश्यवाग्भीषितभूरिभीरु-
भवो रवस्तावदचेतयत्तम् ॥
द्दिगीशसंदेशमजल्पदल्पम् ।
अदृश्यवाग्भीषितभूरिभीरु-
भवो रवस्तावदचेतयत्तम् ॥
अन्वयः
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सः यावत् विकल्पोपहृताम् प्रियाम् अल्पम् दिगीशसन्देशम् अजल्पत्, तावत् अदृश्यवाक्भीषितभूरिभीरुभवः रवः तम् अचेतयत्।
Summary
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Just as he began to speak a little of the message from the guardian deities to his beloved, whom he had mistaken for the real one, a noise from many timid women frightened by an invisible voice brought him back to his senses.
पदच्छेदः
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| प्रियाम् | प्रिया (२.१) | to his beloved |
| विकल्पोपहृताम् | विकल्प–उपहृत (२.१) | brought by imagination |
| सः | तद् (१.१) | he |
| यावत् | यावत् | just as |
| दिगीशसन्देशम् | दिगीश–सन्देश (२.१) | the message of the guardian deities |
| अजल्पत् | अजल्पत् (√जल्प् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was speaking |
| अल्पम् | अल्प (२.१) | a little |
| अदृश्यवाक्भीषितभूरिभीरुभवः | अदृश्य–वाच्–भीषित–भूरि–भीरु–भव (१.१) | a sound produced by many timid women frightened by an invisible voice |
| रवः | रव (१.१) | a sound |
| तावत् | तावत् | then |
| अचेतयत् | अचेतयत् (√चित् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made him aware |
| तम् | तद् (२.१) | him |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रि | यां | वि | क | ल्पो | प | हृ | तां | स | या | व |
| द्दि | गी | श | सं | दे | श | म | ज | ल्प | द | ल्पम् |
| अ | दृ | श्य | वा | ग्भी | षि | त | भू | रि | भी | रु |
| भ | वो | र | व | स्ता | व | द | चे | त | य | त्तम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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