अयं क इत्यन्यनिवारकाणां
गिरा विभूर्द्वारि विभुज्य कण्ठम् ।
दृशं ददौ विस्मयनिस्तरङ्गां
स लङ्घितायामपि राजसिंहः ॥
अयं क इत्यन्यनिवारकाणां
गिरा विभूर्द्वारि विभुज्य कण्ठम् ।
दृशं ददौ विस्मयनिस्तरङ्गां
स लङ्घितायामपि राजसिंहः ॥
गिरा विभूर्द्वारि विभुज्य कण्ठम् ।
दृशं ददौ विस्मयनिस्तरङ्गां
स लङ्घितायामपि राजसिंहः ॥
अन्वयः
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द्वारि अन्यनिवारकाणाम् "अयम् कः" इति गिरा (सत्याम्), लङ्घितायाम् अपि सः राजसिंहः विभूः कण्ठम् विभुज्य विस्मयनिस्तरङ्गाम् दृशम् ददौ।
Summary
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At the door, despite the words "Who is this?" from those trying to stop others, that lion among kings, Nala, even when bypassed, bent his neck and cast a gaze that was motionless with wonder.
पदच्छेदः
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| अयम् | इदम् (१.१) | This |
| कः | किम् (१.१) | who |
| इति | इति | thus |
| अन्यनिवारकाणाम् | अन्य–निवारक (६.३) | of those preventing others |
| गिरा | गिर् (३.१) | with the words |
| विभूः | विभु (१.१) | the lord (Nala) |
| द्वारि | द्वार् (७.१) | at the door |
| विभुज्य | विभुज्य (वि√भुज्+ल्यप्) | having bent |
| कण्ठम् | कण्ठ (२.१) | his neck |
| दृशम् | दृश् (२.१) | a gaze |
| ददौ | ददौ (√दा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | cast |
| विस्मयनिस्तरङ्गाम् | विस्मय–निस्तरङ्ग (२.१) | motionless with wonder |
| सः | तद् (१.१) | he |
| लङ्घितायाम् | लङ्घित (√लङ्घ्+क्त+टाप्, ७.१) | in the state of being bypassed |
| अपि | अपि | even |
| राजसिंहः | राजन्–सिंह (१.१) | the lion among kings |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यं | क | इ | त्य | न्य | नि | वा | र | का | णां |
| गि | रा | वि | भू | र्द्वा | रि | वि | भु | ज्य | क | ण्ठम् |
| दृ | शं | द | दौ | वि | स्म | य | नि | स्त | र | ङ्गां |
| स | ल | ङ्घि | ता | या | म | पि | रा | ज | सिं | हः |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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