परेतभर्तुर्मनसेव दूतीं
नभस्वतेवानिलसख्यभाजः ।
त्रिस्रोतसेवाम्बुपतेस्तदाशु
स्थिरास्थमायातवतीं निरास्थम् ॥
परेतभर्तुर्मनसेव दूतीं
नभस्वतेवानिलसख्यभाजः ।
त्रिस्रोतसेवाम्बुपतेस्तदाशु
स्थिरास्थमायातवतीं निरास्थम् ॥
नभस्वतेवानिलसख्यभाजः ।
त्रिस्रोतसेवाम्बुपतेस्तदाशु
स्थिरास्थमायातवतीं निरास्थम् ॥
अन्वयः
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(अहम्) स्थिरास्थम् आयातवतीम् दूतीम्, परेतभर्तुः मनसा इव, अनिलसख्यभाजः नभस्वता इव, अम्बुपतेः त्रिस्रोतसा इव, तत् आशु निरास्थम् ।
Summary
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I quickly rejected the messenger who had come with a firm resolve, just as a widow rejects worldly thoughts, as fire rejects its friend the wind when being extinguished, and as the ocean rejects the Ganges by absorbing it.
पदच्छेदः
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| पेतभर्तुः | पेतभर्तृ (६.१) | of a widow |
| मनसा | मनस् (३.१) | with the mind |
| इव | इव | like |
| दूतीम् | दूती (२.१) | the messenger |
| नभस्वता | नभस्वत् (३.१) | by the wind |
| इव | इव | like |
| अनिलसख्यभाजः | अनिल–सख्य–भाज् (६.१) | of one who has friendship with the wind (fire) |
| त्रिस्रोतसा | त्रिस्रोतस् (३.१) | by the Ganges |
| इव | इव | like |
| अम्बुपतेः | अम्बुपति (६.१) | of the lord of waters (ocean) |
| तत् | तद् | that |
| आशु | आशु | quickly |
| स्थिरास्थम् | स्थिर–आस्थ (२.१) | one with firm resolve |
| आयातवतीम् | आयातवत् (आ√या+क्तवतु, २.१) | who had come |
| निरास्थम् | निरास्थम् (निर्√अस् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I rejected |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रे | त | भ | र्तु | र्म | न | से | व | दू | तीं |
| न | भ | स्व | ते | वा | नि | ल | स | ख्य | भा | जः |
| त्रि | स्रो | त | से | वा | म्बु | प | ते | स्त | दा | शु |
| स्थि | रा | स्थ | मा | या | त | व | तीं | नि | रा | स्थम् |
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