अध्वाग्रजाग्रन्निभृतापदन्धुः
बन्धुर्यदि स्यात्प्रतिबन्धुमर्हः ।
जोषं जनः कार्यविदस्तु वस्तु
प्रच्छया निजेच्छा पदवीं मुदस्तु ॥
अध्वाग्रजाग्रन्निभृतापदन्धुः
बन्धुर्यदि स्यात्प्रतिबन्धुमर्हः ।
जोषं जनः कार्यविदस्तु वस्तु
प्रच्छया निजेच्छा पदवीं मुदस्तु ॥
बन्धुर्यदि स्यात्प्रतिबन्धुमर्हः ।
जोषं जनः कार्यविदस्तु वस्तु
प्रच्छया निजेच्छा पदवीं मुदस्तु ॥
अन्वयः
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यदि बन्धुः अध्व-अग्र-जाग्रत्-निभृत-आपत्-बन्धुः स्यात् तर्हि सः प्रतिबन्धुम् अर्हः न । कार्यवित् जनः जोषम् अस्तु । तु निज-इच्छा मुदः पदवीम् अस्तु । वस्तु प्रच्छया ज्ञायताम् ।
Summary
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If a friend is a true friend in hidden calamities, he is not one to obstruct. Let a person who knows what to do remain silent. Let one's own desire be the path to joy. The truth of the matter should be ascertained by asking.
पदच्छेदः
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| अध्वाग्रजाग्रन्निभृतापदन्धुः | अध्वन्–अग्र–जाग्रत् (√जागृ+शतृ)–निभृत–आपद्–बन्धु (१.१) | a friend in hidden calamities that appear at the forefront of life's path |
| बन्धुः | बन्धु (१.१) | a friend |
| यदि | यदि | if |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| प्रतिबन्धुम् | प्रतिबन्धुम् (प्रति√बन्ध्+तुमुन्) | to obstruct |
| अर्हः | अर्ह (१.१) | worthy |
| जोषम् | जोषम् | silently |
| जनः | जन (१.१) | a person |
| कार्यवित् | कार्यविद् (१.१) | who knows what to do |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let him be |
| वस्तु | वस्तु (१.१) | the matter |
| प्रच्छया | प्रच्छ् (३.१) | by asking |
| निजेच्छा | निज–इच्छा (१.१) | one's own desire |
| पदवीम् | पदवी (२.१) | the path |
| मुदः | मुद् (६.१) | of joy |
| तु | तु | but |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ध्वा | ग्र | जा | ग्र | न्नि | भृ | ता | प | द | न्धुः | |
| ब | न्धु | र्य | दि | स्या | त्प्र | ति | ब | न्धु | म | र्हः | |
| जो | षं | ज | नः | का | र्य | वि | द | स्तु | व | स्तु | |
| प्र | च्छ | या | नि | जे | च्छा | प | द | वीं | मु | द | स्तु |
| त | त | ज | ग | ग | |||||||
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