नित्यं नियत्या परवत्यशेषे
कः संविदानोऽप्यनुयोगयोग्यः ।
अचेतना सा च न वाचमर्हे-
द्वक्ता तु वक्त्रश्रमकर्म भुङ्क्ते ॥
नित्यं नियत्या परवत्यशेषे
कः संविदानोऽप्यनुयोगयोग्यः ।
अचेतना सा च न वाचमर्हे-
द्वक्ता तु वक्त्रश्रमकर्म भुङ्क्ते ॥
कः संविदानोऽप्यनुयोगयोग्यः ।
अचेतना सा च न वाचमर्हे-
द्वक्ता तु वक्त्रश्रमकर्म भुङ्क्ते ॥
अन्वयः
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अशेषे जगति नित्यम् नियत्या परवति सति, संविदानः अपि कः अनुयोगयोग्यः भवति? सा नियतिः च अचेतना अस्ति, अतः वाचम् न अर्हेत् । वक्ता तु वक्त्रश्रमकर्म भुङ्क्ते ।
Summary
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When the entire world is always dependent on fate, what knowing person is fit to be questioned? And that fate, being insentient, does not deserve to be addressed. The speaker (who blames) only experiences the futile effort of speech.
पदच्छेदः
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| नित्यम् | नित्यम् | always |
| नियत्या | नियति (३.१) | by fate |
| परवति | परवत् (७.१) | being dependent |
| अशेषे | अशेष (७.१) | the entire (world) |
| कः | किम् (१.१) | who |
| संविदानः | संविदान (सम्√विद्+शानच्, १.१) | knowing |
| अपि | अपि | even |
| अनुयोगयोग्यः | अनुयोग–योग्य (१.१) | fit to be questioned |
| अचेतना | अचेतन (१.१) | insentient |
| सा | तद् (१.१) | she (fate) |
| च | च | and |
| न | न | not |
| वाचम् | वाच् (२.१) | speech (blame) |
| अर्हेत् | अर्हेत् (√अर्ह् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | deserves |
| वक्ता | वक्तृ (१.१) | the speaker |
| तु | तु | but |
| वक्त्रश्रमकर्म | वक्त्र–श्रम–कर्मन् (२.१) | the futile act of tiring the mouth |
| भुङ्क्ते | भुङ्क्ते (√भुज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | experiences |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | त्यं | नि | य | त्या | प | र | व | त्य | शे | षे |
| कः | सं | वि | दा | नो | ऽप्य | नु | यो | ग | यो | ग्यः |
| अ | चे | त | ना | सा | च | न | वा | च | म | र्हे |
| द्व | क्ता | तु | व | क्त्र | श्र | म | क | र्म | भु | ङ्क्ते |
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