प्रक्षीण एवायुषि कर्मकृष्टे
नरान्न तिष्ठत्युपतिष्ठते यः ।
बुभुक्षते नाकमपथ्यकल्पं
धीरस्तमापातसुखोन्मुखं कः ॥
प्रक्षीण एवायुषि कर्मकृष्टे
नरान्न तिष्ठत्युपतिष्ठते यः ।
बुभुक्षते नाकमपथ्यकल्पं
धीरस्तमापातसुखोन्मुखं कः ॥
नरान्न तिष्ठत्युपतिष्ठते यः ।
बुभुक्षते नाकमपथ्यकल्पं
धीरस्तमापातसुखोन्मुखं कः ॥
अन्वयः
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आयुषि कर्मकृष्टे प्रक्षीणे एव यः नरात् न तिष्ठति अपितु उपतिष्ठते, तम् आपातसुखोन्मुखम् अपथ्यकल्पम् नाकम् कः धीरः बुभुक्षते?
Summary
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When life, drawn by karma, is exhausted, one does not remain a mortal but attains a different state. What wise person would desire to enjoy that heaven, which is like an unwholesome diet, pleasant only at first?
पदच्छेदः
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| प्रक्षीणे | प्रक्षीण (प्र√क्षि+क्त, ७.१) | when exhausted |
| एव | एव | only |
| आयुषि | आयुस् (७.१) | when life |
| कर्मकृष्टे | कर्मन्–कृष्ट (√कृष्+क्त, ७.१) | when drawn by karma |
| नरात् | नर (५.१) | from a man |
| न | न | not |
| तिष्ठति | तिष्ठति (√स्था कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | stays |
| उपतिष्ठते | उपतिष्ठते (उप√स्था कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | approaches (a different state) |
| यः | यद् (१.१) | who |
| बुभुक्षते | बुभुक्षते (√भुज् +सन्+उ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | desires to enjoy |
| नाकम् | नाक (२.१) | heaven |
| अपथ्यकल्पम् | अपथ्य–कल्प (२.१) | like an unwholesome diet |
| धीरः | धीर (१.१) | a wise person |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| आपातसुखोन्मुखम् | आपात–सुख–उन्मुख (२.१) | which is pleasant only at first |
| कः | किम् (१.१) | who |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | क्षी | ण | ए | वा | यु | षि | क | र्म | कृ | ष्टे |
| न | रा | न्न | ति | ष्ठ | त्यु | प | ति | ष्ठ | ते | यः |
| बु | भु | क्ष | ते | ना | क | म | प | थ्य | क | ल्पं |
| धी | र | स्त | मा | पा | त | सु | खो | न्मु | खं | कः |
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