एवमादि स विचिन्त्य मुहूर्तं
तानवोचत पतिर्निषधानाम् ।
अर्थिदुर्लभमवाप्य सहर्षा-
न्याच्यमानमुखमुल्लसितश्रि ॥
एवमादि स विचिन्त्य मुहूर्तं
तानवोचत पतिर्निषधानाम् ।
अर्थिदुर्लभमवाप्य सहर्षा-
न्याच्यमानमुखमुल्लसितश्रि ॥
तानवोचत पतिर्निषधानाम् ।
अर्थिदुर्लभमवाप्य सहर्षा-
न्याच्यमानमुखमुल्लसितश्रि ॥
अन्वयः
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निषधानाम् पतिः सः एवम् आदि मुहूर्तम् विचिन्त्य, अर्थिदुर्लभम् अवाप्य सहर्षान्, याच्यमानमुखम्, उल्लसितश्रीः (सन्) तान् अवोचत ।
Summary
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That lord of the Nishadhas (Nala), having pondered thus for a moment, and having become radiant with joy upon attaining the rare sight of supplicants and seeing their expectant faces, spoke to them.
पदच्छेदः
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| एवम् | एवम् | thus |
| आदि | आदि (२.१) | and so on |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विचिन्त्य | विचिन्त्य (वि√चिन्त्+ल्यप्) | having thought |
| मुहूर्तम् | मुहूर्त (२.१) | for a moment |
| तान् | तद् (२.३) | to them |
| अवोचत | अवोचत (√वच् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| पतिः | पति (१.१) | the lord |
| निषधानाम् | निषध (६.३) | of the Nishadhas |
| अर्थिदुर्लभम् | अर्थिन्–दुर्लभ (२.१) | (the sight) rare for supplicants |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| सहर्षान् | सहर्ष (२.३) | joyful ones |
| याच्यमानमुखम् | याच्यमान (√याच्+शानच्)–मुख (२.१) | the face of one being solicited |
| उल्लसितश्रीः | उल्लसित (उद्√लस्+क्त)–श्री (१.१) | with enhanced radiance |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | व | मा | दि | स | वि | चि | न्त्य | मु | हू | र्तं |
| ता | न | वो | च | त | प | ति | र्नि | ष | धा | नाम् |
| अ | र्थि | दु | र्ल | भ | म | वा | प्य | स | ह | र्षा |
| न्या | च्य | मा | न | मु | ख | मु | ल्ल | सि | त | श्रि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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