माममीभिरिह याचितवद्भिः
दातृजातमवमत्य जगत्याम् ।
यद्यशो मयि निवेक्षितमेत-
न्निष्क्रयोऽस्तु कतमस्तु तदीयः ॥
माममीभिरिह याचितवद्भिः
दातृजातमवमत्य जगत्याम् ।
यद्यशो मयि निवेक्षितमेत-
न्निष्क्रयोऽस्तु कतमस्तु तदीयः ॥
दातृजातमवमत्य जगत्याम् ।
यद्यशो मयि निवेक्षितमेत-
न्निष्क्रयोऽस्तु कतमस्तु तदीयः ॥
अन्वयः
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इह जगत्याम् दातृजातम् अवमत्य अमीभिः याचितवद्भिः (युष्माभिः) यत् यशः मयि निवेक्षितम्, एतत् (यशः) अस्तु । तु तदीयः कतमः निष्क्रयः (अस्ति)?
Summary
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Nala says to the gods: "By you, who have come as supplicants, disregarding all other donors in this world, this fame has been invested in me. Let this fame be. But what could be its price or repayment?"
पदच्छेदः
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| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अमीभिः | अदस् (३.३) | by these |
| इह | इह | here |
| याचितवद्भिः | याचितवत् (√याच्+क्तवतु, ३.३) | by those who have begged |
| दातृजातम् | दातृ–जात (२.१) | the community of donors |
| अवमत्य | अवमत्य (अव√मन्+ल्यप्) | having disregarded |
| जगत्याम् | जगती (७.१) | in the world |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| यशः | यशस् (१.१) | fame |
| मयि | अस्मद् (७.१) | in me |
| निवेशितम् | निवेशित (नि√विश्+णिच्+क्त, १.१) | has been invested |
| एतत् | एतद् (१.१) | this |
| निष्क्रयः | निष्क्रय (१.१) | repayment |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| कतमः | कतम (१.१) | which |
| तु | तु | but |
| तदीयः | तदीय (१.१) | its |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | म | मी | भि | रि | ह | या | चि | त | व | द्भिः |
| दा | तृ | जा | त | म | व | म | त्य | ज | ग | त्याम् |
| य | द्य | शो | म | यि | नि | वे | क्षि | त | मे | त |
| न्नि | ष्क्र | यो | ऽस्तु | क | त | म | स्तु | त | दी | यः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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