मा धनानि कृपणः खलु जीवं
तृष्णयार्पयतु जातु परस्मै ।
तत्र चैष कुरुते मम चित्रं
यत्तु नार्पयति तानि मृतोऽपि ॥
मा धनानि कृपणः खलु जीवं
तृष्णयार्पयतु जातु परस्मै ।
तत्र चैष कुरुते मम चित्रं
यत्तु नार्पयति तानि मृतोऽपि ॥
तृष्णयार्पयतु जातु परस्मै ।
तत्र चैष कुरुते मम चित्रं
यत्तु नार्पयति तानि मृतोऽपि ॥
अन्वयः
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कृपणः तृष्णया धनानि मा अर्पयतु, खलु जीवम् जातु परस्मै (मा अर्पयतु) । तत्र च एषः मम चित्रम् कुरुते यत् तु मृतः अपि तानि न अर्पयति ।
Summary
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Let the miser, due to greed, not give away his wealth; indeed, let him never give his life to another. But this causes me wonder: that even when dead, he does not give it away.
पदच्छेदः
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| मा | मा | let not |
| धनानि | धन (२.३) | wealth |
| कृपणः | कृपण (१.१) | a miser |
| खलु | खलु | indeed |
| जीवं | जीव (२.१) | life |
| तृष्णयार्पयतु | तृष्णा (३.१)–अर्पयतु (√ऋ +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | due to greed, give away |
| जातु | जातु | ever |
| परस्मै | पर (४.१) | to another |
| तत्र | तत्र | in that matter |
| चैष | च–एतद् (१.१) | and this |
| कुरुते | कुरुते (√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | causes |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| चित्रं | चित्र (२.१) | wonder |
| यत्तु | यद् (१.१)–तु | that but |
| नार्पयति | न–अर्पयति (√ऋ +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does not give away |
| तानि | तद् (२.३) | them |
| मृतोऽपि | मृत (√मृ+क्त, १.१)–अपि | dead even |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | ध | ना | नि | कृ | प | णः | ख | लु | जी | वं |
| तृ | ष्ण | या | र्प | य | तु | जा | तु | प | र | स्मै |
| त | त्र | चै | ष | कु | रु | ते | म | म | चि | त्रं |
| य | त्तु | ना | र्प | य | ति | ता | नि | मृ | तो | ऽपि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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